कल तोड़ी गई, आज बँटी हूँ

कल टूटा था, आज बँटा हूँ।
कहना न होगा मैं क्या हूँ।।

चले चलो! चरैवेति! आगे बढ़ो, यार! मूव ऑन! कितना आसान है ये सब कहना, कितना मुश्किल है उस पर अमल करना, जो कि अक्सर हर महान सूक्ति के साथ होता है : सत्यम् वद, धर्मं चर का हश्र हम जानते हैं! अपने एक ग़मज़दा दोस्त को भी फ़ैसला सुनने के बाद मैंने यही नसीहत दी थी : यार इमोशनल मत होओ! 6 दिसंबर 1992 को शहीद बाबरी मस्जिद, जिसे अलग-अलग लोगों द्वारा रामजन्म भूमि या फिर विवादित ढाँचा कहा गया, अब वापिस विभाजित है। ठीक तो है, जिस विवाद को समाज हल नहीं कर पाता, जिसे राजनीति सुलझाने में घबड़ाती है, उसे अगर उच्च न्यायालय के तीन मिले-जुले न्यायाधीशों के खंडपीठ ने तीन हिस्सों में बाँट दिया तो सहज ज्ञान तो बोमन ईरानी के रिक्शेवाले के शब्दों में यही कहेगा न : ‘किसी को तो अक़ल आई!’

मैं भी अगर अपने यादों के जीवित गाँव के ज़िन्दा नुमाइंदे के रूप में पंचायती अवतार में आ जाऊँ तो ख़ुद को उसी रिक्शे वाले के साथ खड़ा पाता हूँ। पर किसी और कोने से की गई ‘भूल जाओ’ की हर माँग कलेजे का एक हिस्सा काट लेती है। कलेजे को काट कर न्याय की कोई स्वीकृति संभव है? शायद पंचायत में ऐसा हो भी जाता पर मैं क्या करूँ, मेरे प्यारे अलगू चौधरी और जुम्मन शेख़ के
बीच में राष्ट्र आ गया। प्रेमचंद के आदर्शवादी यथार्थवाद के बावजूद पंचायत इतना गिरा हुआ शब्द हो गया है कि लोग चलते-फिरते उसे गलियाने लगे। शायद ठीक ही!

लेकिन जिस देश की आज़ादी का भविष्य पंचायती फ़ैसले की बुनियाद पर बना हो, जहाँ आज़ादी
के बाद की ख़ूँरेज़ी कई मौक़ों पर गांधी की पंचायती गुहारों से रुकी या टली हो, जहाँ आज भी
पंचायतें अंतर्जातीय शादियाँ करने पर प्रेमियों का क़त्ल या उन्हें ज़लावतन कर देती हैं, जहाँ मनरेगा की मज़दूरी बाँटने के लिए अभी-भी ग्रामीण निगरानी समितियों को उपयुक्त इकाई माना जाता हो, वहाँ पंचायती शब्द का ऐसा उपहास कुछ हद तक समझ में आता है पर किंचित परेशान भी करता है।

गोकि मेरी निजी ज़िंदगी और मेरे विश्वासों को इससे रत्ती-भर फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वहाँ पर क्या बनता है, क्योंकि मेरा जो था वह तो 6 दिसंबर को ही टूट गया था।

उसके बाद तो लोगों ने अपनी पार्टियों के बहुमत बनाये, सरकारें बनाईं। होशियारी से भूल गए थे पर अब तो लगता है कि मंदिर भी बना लेंगे, कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं। अठारह साल गुज़र चुके हैं, हम कितना आगे बढ़ चुके हैं। अब हम आम आदमी – ठेले-खोमचेवालों – को सड़कों से भगाकर उसे राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन पर आभासी तौर पर देखते-दिखाते और गर्वान्वित होते हैं: देखिए हमारी
सांस्कृतिक विविधता – रंगबिरंगा सुपरपावर परजातंतर! हमारी जनजातियाँ कितना अच्छा नाचती हैं, मगर ये नक्सलवादी उन्हें मौक़ा ही नहीं देते, बंदूक़ थमा देते हैं। नगा-मणिपुरी वेशभूषा कितनी
सजती है वेदमंत्रों और सूर्यनमस्कार के बीच – काश ये दो कौड़ी के बुद्धिजीवी या बाहरी ताक़तें उन्हें जीने की मोहलत तो दें। फ़ैसला आने के बाद भी रहमान कितना अच्छा गाता है: जय हो! लेटअस मूव ऑन!

इस सूरते-हाल में कौन हैं वे लोग जो मूवियाना नहीं चाहते हैं, फँसे रहना चाहते हैं अपने पुराने साँचों-खाँचों में? चंद इतिहासकार जो कभी भी इस देश के नहीं रहे। ये सहमत वाले जिनसे हम हमेशा असहमत रहे हैं! और ये अल्ट्रा-सेक्युलरिस्ट – (ये अपेक्षाकृत नया शब्द है, पचने में वक़्त लेगा) – हमें तो असम के अलगाववादी दिनों से ही अल्ट्रा-फल्ट्रावादियों से एलर्जी रही है। हू केयर्स! जीडीपी देखो और चले-चलो, कोई साथ न दे तो भी इन्वेस्ट करो और एकला चलो! कारवाँ तो बन ही जाएगा।
देखो तो कितने-सारे लोग चलने पर उतारू हैं!

मज़ेदार बात होती अ‌गर इतनी दुखद न होती कि विभाजन के बाद भी भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रपति ने यही कहा था – हमें आप लोगों के कृत्य ने दुनिया में बदनाम कर दिया है। लेट अस फ़ॉरगेट ऐण्ड मूव ऑन! कुछ करो मत, अपने-आप इधर इतनी गरम हवाएँ चलेंगी कि जिन्हें झुलसना है वे झुलसने लगेंगे, और सब-कुछ ख़ुद-ब-ख़ुद ठीक हो जाएगा। लौहपुरुष ने कुछ ऐसा ही कहा था लखनऊ में हिन्दुओं से कि मुसलमान त्राहिमाम् करते हुए गांधीजी के पास आए थे। कुछ हुआ नहीं, बस
एक फ़िल्म बनी ‘गरम हवा’ नाम से, कई दहाइयों बाद!

मैं भी चल देता अगर कुछ लोगों ने इस फ़ैसले को संख्यात्मक जनवाद से प्रेरित अपने कपोलकल्पित
इतिहास की तस्दीक़ न मान लिया होता। मैं तो चल ही देता अगर संघ-परिवार में से किसी ने जीत
के मौक़े पर भी फ़क़त इतनी दरियादिली दिखायी होती कि कह उठते : हम मस्जिद भी वहीं बनायेंगे! मैं इसलिए भी चल देता – और हर कोई चलता ही रहता है कोई कहे न कहे, क्योंकि बक़ौल राही
मासूम रज़ा, बलवे की कहानियाँ ख़त्म हो जाती हैं, लेकिन ज़िन्दगी चलती रहती है – कि उसको
चलना है।

लेकिन मुझे इसका भी एहसास है कि हर बलवा मेरे पुराने ज़ख़्म ताज़ा कर देता है! हर बलवा मुझे
अपने घर को दो पग पीछे समेट लेने को बाध्य कर देता है। और मुझे अपने ही घर में लगातार
सिमटते-सिकुड़ते जाना मंज़ूर नहीं। मैं सुप्रीम कोर्ट जाऊँगा, इसलिए नहीं कि मुझे पता है कि मेरे पक्ष में फ़ैसला होगा, बल्कि सिर्फ़ ये देखने के लिए कि मेरे घर की चौहद्दियों को सिकोड़ने की साज़िश कहाँ तक फैली है। और कहाँ तक फैलेगी। क्योंकि तैंतीस करोड़ देवी-देवता और उनके क़ानूनी लल्ला अगर अपना-अपना हिस्सा माँगने चल देंगे तो मेरा निराकार अल्लाह तो बेघर हो ही जाना है!

पर तब तक या उसके बाद भी मैं तो चलूँगा ही, रुकूँगा नहीं, ख़ातिर जमा रखें! किसके साथ, ये
नहीं बता सकता।

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पत्रकारिता के विश्वविद्यालय में संघ की घुसपैठ: शहनवाज़ नज़ीर

शहनवाज़ नज़ीर का गेस्ट पोस्ट। शहनवाज़ दैनिक भास्कर में अखबारनवीस हैं।
नाम बृज किशोर कुठियाला, पैदाइश मार्च 1948 शिमला, तालीम समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट, पता फिलहाल भोपाल, पेशे से पत्रकारिता के पंडित हैं और तबियत से संघ के सिपाही। कुठियाला के कमान संभालने के बाद से माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव संचार विश्वविघालय की आबो हवा में घुटन का माहौल है लेकिन इस घुटन के खिलाफ बगावत का असर भी दिखने लगा है।

23 मार्च, भगत सिंह की शहादत के दिन छात्रों द्नारा विश्वविघालय की दीवारों पर चस्पा किए गए पर्चों को हटा दिया गया है, कैंटीन के खम्भे पर चिपकी पाश की कविता भी फट चुकी है लेकिन प्रवेश द्वार के उपर लगा एक पर्चा किसी तरह बच गया। यह पर्चा परिसर में आने जाने वालों का कुछ इस तरह स्वागत करता है, “मैं विरोध में हूं क्योंकि मुझे अपना होना प्रमाणित करना है, हमें समाज में ऊंच नीच की भावनाओं को बदलना होगा, संघर्ष ही हमें परिष्कृत बनाएगा, इंकलाब ज़िन्दाबाद”। यह पर्चा विश्वविघालय के कुलपति प्रोफेसेर बृज किशोर कुठियाला की कारगुजारियों के विरोध में लगाया गया है जो देश में पत्रकारिता के इकलौते विश्वविघालय को संघ की पाठशाला बनाने की फिराक़ में हैं।
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युद्ध के रूपक का जाल

अपने नए बंद के दौरान सी.पी.आई.( माओवादी) ने छत्तीसगढ़ और बंगाल में अर्ध-सैन्य बल के सदस्यों के साथ बस में सफ़र कर रहे साधारण ग्रामीणों की हत्या करने के बाद जो बयान दिया है उससे यह साफ़ है कि अभी शायद इससे भी क्रूरतापूर्ण कार्रवाइयां देखने को मिल सकती हैं. उनके प्रवक्ता ने कहा कि उन्होंने पहले ही छतीसगढ़ के ग्रामीणों को यह बता दिया था कि उन्हें इस युद्ध की विशेष परिस्थिति में क्या करना है और क्या नहीं करना है. मसलन, पुलिस या सैन्य बल के लोगों के साथ किसी भी तरह का कारोबार या सामजिक व्यवहार प्रतिबंधित है, उनके साथ किसी सवारी गाडी में सफ़र नहीं करना है. इसके आगे उनसे यह भी कहा गया है कि उन्हें पुलिस या सैन्य बल की गतिविधियों पर नज़र रखनी है, उनके पास हथियारों का अंदाज़ करना है और इसकी खबर जनता सरकार को देते रहना है. इस दल के प्रवक्ता ने कहा कि साधारण लोगों का मारा जाना अफसोसनाक है लेकिन एक तरह से वे खुद इसके लिए जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने चेतावनी का उल्लंघन किया था. Continue reading

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सुपरहीरो की उदासी का सबब – अभय कुमार दुबे

[अभय कुमार दुबे का यह लेख नवभारत टाइम्‍स मे छपा था। यहाँ इसे दीवान लिस्‍ट के सौजन्‍य से पेश किया जा रहा है। सितम्बर 2008 मे! यह लेख क़ाफ़िला में छपा था। उनका यह आलेख अमरीकी पॉपुलर कलचर के कई किरदारो की यकायक गायब होती 'प्रासंगिकता' पर नज़र डालता है। इस दिलचस्‍प लेख का एक पहलू वह है जो शीतयुद्धोत्तर अमरीका की बदली हुई राजनीतिक हैसियत के साथ पॉपुलर मानसिकता का एक गहरा रिश्‍ता देखता है। पढ़ते हुए अनायास स्‍लावोज ज़िज़ेक का एक लेख याद आ गया जिसमें वे उस अमरीकी फ़ंतासी (या दुस्‍वप्‍न?) की बात करते हैं जिसमें एक आम अमरीकी हमेशा किन्‍हीं एलियन्‍स या डायनोसॉरों द्वारा आक्रांत होने के रोमांचक ख़ौफ़ में जीता है, और जो 11 सितम्‍बर 2001 को अचानक चरितार्थ होती है। शायद किस्‍सा बैटमैन आदि पर ख़त्‍म नहीं होता।]

फैंटम, जादूगर मैंड्रेक  और फ्लैश गॉर्डन के कारनामों की खुराक पर बचपन गुजारने वाले भारतवासियों की पीढ़ी को मालूम होना चाहिए कि कॉमिक्स के पन्नों से हमारी-आपकी जिंदगी में झांकने वाले सुपर  हीरो किरदारों की दुनिया अचानक बदल गई है। अमानवीय ताकतों से लैस जो चरित्र दुनिया को भीषण किस्म के खलनायकों से बचाने का दम भरते थे, आज अपनी ही उपयोगिता के प्रति संदिग्ध हो गए हैं।

जो लोग फैंटेसी की दुनिया से बाहर नहीं निकलना चाहते उन्हें यह देख कर अफसोस हो सकता है कि  उनका ‘फ्रेंडली नेबर’ स्पाइडरमैन पिछले दिनों रिटायर होते-होते रह गया। अब गौथम सिटी का रक्षक बैटमैन भी बुराई से लड़ने का अपना फर्ज निभाने में खुद को नाकाफी महसूस करने लगा है। इस बात का एहसास पिछले दिनों हमारे देश में सुपरहिट हुई हॉलिवुड की कुछ फिल्मों को देख कर हुआ है। Continue reading

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एक पुराने कॉमरेड की अंतिम यात्रा: सांत्वना निगम

निम्नलिखित कहानी सांत्वना निगम द्वारा भेजी गई एक आमंत्रित रचना है।

नोट: फ़ायरफ़ॉक्स या ऑपेरा इस्तेमाल करने वाले पाठक कृपया पढ़ते वक़्‍त फ़ॉन्ट बढ़ाने के लिए ( Ctrl +) दबाएं।

संस्मरण

एक पुराने कॉमरेड की अंतिम यात्रा

“साला भैंचो गॉरबाचोव, कैपिटलिस्टों का एजेंट … सब तोड़-फोड़ कर चकनाचूर कर दिया। युगों की मेहनत के ऊपर खड़े महल को ताश के घर की तरह ढहा दिया। हरामी ने ग्लासनोस्त हूँ: चूतिया कहीं का” संझले भैया चोट खाए सांप की तरह फुंफकार रहे थे। हालाँकि मेरा मन भी उदासी की गहरी परतों के नीचे दब चुका था, फिर भी मैंने जैसे उन्हें दिलासा देने के लिए कहा “भैया याद है? स्टडी सर्कल में जब हम तुमसे प्रश्न पूछते थे तुम अकसर कहते थे – ‘इतिहास अपने रास्ते पर चलता है लेकिन बेतरतीबी से नहीं – कार्यकारण से जुड़ी होती है सारी घटनाए। सड़ी गली समाज व्यवस्था से ही उपजती है क्रांति वग़ैरह-वग़ैरह।’ शायद उस समाज में भी सड़न आ गई थी, नहीं तो भुरभुराकर ढह कैसे गया?” “अरे रखो तुम्हारी अधकचरी थ्योरीज़, ख़ाक समझाती हो, ख़ाक़ जानती हो।” भैया चिड़चिड़ा कर बोले। “मुझे तो लगता है साम्यवाद फिर से वापस आएगा, शायद किसी और शक़्ल में” मैंने कमज़ोर-सी आवाज़ में कहा। “खाक़ आएगा।” यह कैपिटलिस्ट सिस्टम, यह कंज़्यूमरिज़्म का दानव सब कुछ निगल जाएगा। संझले भैया दहाड़े। हरियाणा के एक छोटे-से क़स्बे के मकान के आँगन में यह वार्तालाप चल रहा था। मैं अपने “पुराने कॉमरेड” भाई से मिलने गई थी। महीने में एक बार जाती थी – पिछले तीस सालों से । Continue reading

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बीच का रास्ता नहीं होता, कॉमरेड!: ईश्वर दोस्त

ईश्‍वर दोस्त का यह लेख क़ाफ़िला में कुछ अरसा पहले छपा था

ध्रुवीकरण की खासियत यह होती है कि वह बीच की जगह तेजी से खत्म करता जाता है। चाहे वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो या अस्मिता पर आधारित या किसी और मुद्दे पर। राज्य की दमनकारी हिंसा बनाम माओवादी हिंसा एक ऐसा ही ध्रुवीकरण है। इस सरलीकरण में छिपी राजनीति पर सवाल उठाना जरूरी हो गया है। युद्ध की भाषा बोलती और बंदूक को महिमामंडित करती इस राजनीति के निशाने पर क्या जनसंघर्षों की लोकतांत्रिक जगह नहीं है? माओवादियों के सबसे बड़े दल पीडब्ल्यूजी के नाम के साथ ही जनयुद्ध शब्द लगा हुआ है। छत्तीसगढ़ सरकार ने एक सरकारी जनयुद्ध को सलवा जुडूम के नाम से प्रायोजित किया हुआ है। केंद्र सरकार ने पहली बार माओवाद के खिलाफ युद्ध की शब्दावली का इस्तेमाल किया है, फिर उस पर सफाई भी दी है। अगर माओवाद लोकतंत्र के प्रति अपनी नफरत नहीं छिपाता तो उत्तर-पूर्व से लेकर गरीब आदिवासी इलाकों तक कई सरकारें भी राजनीतिक-सामाजिक गुत्थियों को महज सुरक्षा के सवाल में तब्दील कर बंदूक की नली पर टंगे विशेष सुरक्षा कानूनों के जरिए सुलझाना चाहती हैं।

अन्याय के खिलाफ जनलामबंदी, संघर्ष और प्रतिरोध की सुदीर्घ परंपरा को युद्ध के अतिरेक में ढांपने की कोशिश की जा रही है। युद्ध सीधा सवाल करता है कि तय करो किस ओर हो तुम? यह सवाल एक-दूसरे से युद्ध करता या उसके लिए पर तौलता कोई भी पक्ष किसी से भी पूछ सकता है।
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सुन ओ बेरहम…: पॉल रॉबसन के ‘ओल मैन रिवर’ और भूपेन हाजरिका के ‘बिस्‍तीर्ण दुपारे’ की तर्ज़ पर

‘ओल मैन रिवर’ एक अमरीकी लोकगीत था जो दक्षिणी अमरीका के मिसिसिपी नदी वाले इलाक़ों में गाया जाता था। वैसे मूलत: यह गीत एक मशहूर रूसी लोकगीत ‘साँग ऑफ़ द वॉलगा बोटमेन’ का अमेरिकी संस्करण माना जाता है।  दक्षिण अमरीका के मिसिसिपी के आसपास के  इलाक़ों में ग़ुलामी का बोलबाला बहुत दिनों तक बना रहा। लिहाज़ा, इस गीत को पॉल रॉबसन ने ग़ुलामी के संदर्भ में नए सिरे ढाला। मिसिसिपी के ग़फ़लतज़दा अंदाज़ को रॉबसन ने ग़ुलामी के प्रति उसकी बेरुखी के रूप में पेश किया। कोलम्बि‍या युनिवर्सिटी में पढ़ते हुए भूपेन हाज़रिका की मुलाक़ात रॉबसन से हुई और इस गीत से वे इतना मुतास्सिर हुए कि उन्होंने उसे अपनी ज़ुबान, अहमिया में ‘बिस्तीर्ण पारोरे’ के रूप में अडैप्ट कर लिया। मिसिसिपी की जगह उनका वह गीत ब्रह्मपुत्र को सम्बोधित करता है। बाद में उन्हीं ने इसे बांग्ला में तरजुमा किया जो गंगा से मुखातिब है। अपने कुछ पुराने दोस्तों के आग्रह पर मैंने इसे हाल में हिन्दुस्तानी में ढालने की कोशिश की। पता नहीं उन्हें कितनी पसंद आई, मगर जैसी भी है, पेश है:
सुन ओ बेरहम/ तेरे दोनों पार/ मचा हाहाकार
औ’ तू बेख़बर/ चुपचाप मगर/ ओ गंगा बहती है क्यों?

दीन धरम/ बरबाद हुए/ मानवता तबा(ह) हुई
बेशर्म काहिल सी तू बहती है क्यों?
हौसले बढ़ा/ दीवाना बना / लोग बेशुमार करें इंतजार/
लहरों में तरंग/ मन में उमंग/ जगाती नहीं है क्यों?

फ़ाक़ों के मारे हुओं/ अँधेरों में भटके हुओं-के
अंधेरानशीनी पे मौन है क्यों?
हौसले बढ़ा/ दीवाना बना / लोग बेशुमार करें इंतजार/
लहरों में तरंग/ मन में उमंग/ जगाती नहीं है क्यों?

इंसान अगर ख़ुदग़र्ज़ हुआ/ सामाज अगर बेगाना हुआ
तो ऐसे बेजान समाज को ढहाए ना क्यों?
हौसले बढ़ा/ दीवाना बना / लोग बेशुमार करें इंतजार/
लहरों में तरंग/ मन में उमंग/ जगाती नहीं है क्यों?

तू बेदर्द इठलाती चले/ दिन-रात युँही बल खाती चले
सीने में सदियों के राज़ लिए
आग लगी है/ कुहराम मचा है
अँधेरों से निकलते हुए लाखों-करोड़
शोषितों के जश्‍न से तू अंजान है क्यों?
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सूनी राहों पर – बॉब डिलन के गीत की तर्ज़ पर

1980 के दशक के दौरान बॉब डिलन के इस मशहूर गाने का तरजुमा परचम मंडली के लिए किया गया था। इधर दो दशक से भी ज़्यादा समय ग़ुज़र जाने के बाद अपने चंद रैडिकल युवा साथियों के आग्रह पर उस पर दोबारा निगाह डालने पर लगा इस पर काफ़ी काम की ज़रूरत है। लिहाज़ा कुछ और सफ़ाई कर के छाप रहा हूँ। लोकेश और नवीन को इसके लिए ख़ास तौर पर शुक्रिया।
(बॉब डिलन के गीत ‘द आन्सर इज़ ब्लोइं इन द विंड’ से प्रेरित)

सूनी राहों पर कोई कब तक चले
इससे पहले वो इंसाँ कहलाए?
कितने सागर कोई फ़ाख़्ता उड़े
इससे पहले कि वो चैन पाए?
बारूद की बू फैली हर इक ओर
कैसे यारों अमन आने पाए?
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा
फ़िज़ाओं में जवाब मिलेगा।

कितने बरस कोई पर्वत टिके
इससे पहले कि वो मिट जाए?
कितने युगों तक करें इंतज़ार
जब आज़ादरूहों की उठेगी फ़रियाद?
कब तक आख़िर कोई मुँह फेर कर
हक़ीक़त से दामन बचाए?
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा
फ़िज़ाओं मे जवाब मिलेगा।

जंग के बादल हैं फैले हर सू
अँधेरों में ढका आसमान
और तबाही मची है घर घर में
आँखें अपनी खोलो ज़रा
औ’ कितनी और लाशों के अम्बार लगें
इससे पहले कि आप जान पाएँ?
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा
फ़िज़ाओं में जवाब मिलेगा।

मूल अंगरेज़ी के बोल इस तरह हैं:

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हिन्दी के वर्जित प्रदेश में…

[यह लेख कुछ अरसा पहले वाक् पत्रिका के लिए लिखा गया था - पुराने दोस्त सुधीश पचौरी के इसरार पर। जब यह लेख लिख रहा था तब से अब तक हालात कुछ बदल चुके हैं। इसे लिखते वक़्त तक भी मुझे यह गुमान था कि शायद एक रोज़ मैं हिन्दी के क़िलानुमा परिसर में घुस पाने क़ामयाब हो पाउंगा। हज़ार पहरों में घिरे इस क़िले में एक रोज़ ज़रूर दाखिल होने का मौक़ा मिलेगा। मगर इधर कुछ समय से ऐसा लगने लगा है कि यह क़त्तई मुमकिन नहीं है। हिन्दी के पहरेदार ऐसा कभी न होने देंगे। लिहाज़ा अब इस क़िले में घुसने की कोशिश छोड़ कर हिन्दुस्तानी के खुले और बे-पहरा मैदान में, खुली हवा में टहलना चाहता हूँ। कह देना चाहता हूँ पहरेदारों से कि मैं आप के मुल्क का बाशिंदा नहीं हूँ। मैं एक लावारिस मगर आज़ाद ज़ुबान में पला बढ़ा और वही मेरी ज़मीन है। अलविदा। - आदित्य निगम]

एक ज़माना हुआ हिन्दी से जूझते हुए। यह दीगर बात है कि हिन्दीवालों को इसकी ख़बर तक नहीं। हो भी क्यों? आप बेचते ही क्या हैं?
िन्दी ख़ित्ते में पैदा हुए, पले-बढ़े और इसी आबोहवा में उम्र बिता दी मगर फिर भी, हुज़ूर, हमें हिन्दी की तमीज़ न आई। आज भी इस भाषाई क़िले का कोई न कोई पहरेदार, किसी न किसी ‘अशुद्धि’ को लेकर टोक ही देता है। मगर अक्‍सर ‘हिन्दी सप्ताहों’ और पखवाड़ों के दौरान जब बैंकों की दीवारों पर लिखी वो इबारतें देखता हूँ जो ग्राहकों को ‘चेक हिन्दी में भरने’ की दावत दे रही होती है, तो थोड़ी बहुत तसल्‍ली ज़रूर हो जाती है। लगता है कि मैं अकेला नही हूँ। चलिए, हमें तो हिन्दी न आई, मगर बाक़ियों को क्या हो गया? वे क्यों हिन्दी में एक चेक तक नहीं भरते? क्यों इस तरह उनका आह्वान करना पड़ता है? ख़ुद अपनी ज़बान से यह बेदिली कैसी? क्या हुआ उस भाषा को जो हम सब की राष्‍ट्रीय अस्‍मिता को परिभाषित करने की महत्‍वाकांक्षा लेकर मैदाने-जंग में उतरी थी? पिछले सौ-सवा- सौ सालों में कितनों को धराशायी किया इस हिन्दी के रणबाँकुरों ने! क्यों आज वह अपनों से ही इस तरह कट-सी गई है कि उसे इस तरह न्योते बाँटने पड़ रहे हैं? ऐसे ही उलझे हुए सवालों से पिछले सालों में कई बार रूबरू होना पड़ा है, लगातार अपने बरतने लायक़ एक ज़बान की तलाश करते हुए।
बात पुराने ज़माने की है। एक पैसा और पाँच पैसे के सिक्के चला करते थे उन दिनों। चवन्‍नी में चारमीनार सिगरेट का पैकेट आ जाया करता था। जी, हमारी नौजवानी के दिन। 1970 का वह दौर जो उन दिनों तो एक अलग ही मायने रखा करता था। दुनिया को बदल डालने की ख़्‍वाहिश, इंक़लाब का जुनून हम सब के सर पर सवार था। चारू मजुमदार का आह्वान था और हममें उनके नक़्‍शे-कदम पर चल कर एक नई दुनिया बनाने की तमन्‍ना। बस फिर क्या था? कमर कस कर कूद पड़े थे मैदान में। लेकिन ख़ुदा का लाख शुक्र है कि जल्द ही यह समझ में आ गया कि इंक़लाब चंद जाँबाज़ लोग नहीं, अवाम किया करती है। और अवाम है कि सोई पड़ी है। उसे इस बात का कोई इल्म ही नहीं कि इतिहास ने उसके कँधों पर कितनी बड़ी ज़िम्‍मेदारी डाल रखी है। लिहाज़ा अब यह हमारा, इतिहास के कारिंदों का, नए ज़माने के हरकारों का काम हुआ कि सोती हुई जनता को जगाएँ। उसे उसकी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी का अहसास दिलाएं।

तो क़िस्सा यहाँ से शुरू होता है। इस मुई सोई हुई जनता को कैसे जगाया जाए? ज़रूरत है उससे मुख़ातिब होने की। तो फिर परचे निकालिए, मीटिंगें कीजिए, जलसे-जुलूस आयोजित कीजिए। यहीं से शुरू होती है उत्तर-औपनिवेशिक दर्द की एक लम्बी दास्‍तान। मुख़्‍तसर में कहूँ तो तमाम उत्तर-औपनिवेशिक समाजों में हम-जैसा एक बड़ा तबक़ा है जो, अगर एलबर्ट मेम्मी या फ़्रान्ज़ फ़ानों के शब्‍दों में कहा जाए, तो सांस्‍कृतिक रूप से अपाहिज है। वह अपनी भाषा और उसकी सांस्‍कृतिक ज़मीन से कट चुका है। वह अंग्रेज़ी या फ़्रांसीसी में बोलने और लिखने-पढ़ने के लिए अभिशप्त है। उत्तर-औपनिवेशिक दुनिया का बुद्धिजीवी हमेशा एक सांस्‍कृतिक स्किट्ज़ोफ़्रेनिया में जीता है। यह हमारी नियति है। ख़ासकर रैडिकल बुद्धिजीवियों की – जो अपने कमरों में बैठ कर मनन-चिंतन करने की बनिस्बत दुनिया को बदलने की तमन्ना रखते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों को हमेशा अवाम से मुख़ातिब होने में दिक़्कतें पेश आतीं हैं। उन्हें हर वक़्त इस संवाद के लिए ज़बान तलाशनी होती है। अक्सर बनानी होती है। और नेहरूई ज़माने के ‘थ्री लैंग्‍वेज फ़ॉर्मूला’ से निकले हम लोग तो किसी भी भाषा के लायक़ नहीं रह गए थे। हमें तो एक बरतने लायक़ भाषा तलाशने के लिए कहीं ज़्यादा मशक्क़त करनी पड़ी थी।

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