हिन्दी के वर्जित प्रदेश में…
[यह लेख कुछ अरसा पहले वाक् पत्रिका के लिए लिखा गया था - पुराने दोस्त सुधीश पचौरी के इसरार पर। जब यह लेख लिख रहा था तब से अब तक हालात कुछ बदल चुके हैं। इसे लिखते वक़्त तक भी मुझे यह गुमान था कि शायद एक रोज़ मैं हिन्दी के क़िलानुमा परिसर में घुस पाने क़ामयाब हो पाउंगा। हज़ार पहरों में घिरे इस क़िले में एक रोज़ ज़रूर दाखिल होने का मौक़ा मिलेगा। मगर इधर कुछ समय से ऐसा लगने लगा है कि यह क़त्तई मुमकिन नहीं है। हिन्दी के पहरेदार ऐसा कभी न होने देंगे। लिहाज़ा अब इस क़िले में घुसने की कोशिश छोड़ कर हिन्दुस्तानी के खुले और बे-पहरा मैदान में, खुली हवा में टहलना चाहता हूँ। कह देना चाहता हूँ पहरेदारों से कि मैं आप के मुल्क का बाशिंदा नहीं हूँ। मैं एक लावारिस मगर आज़ाद ज़ुबान में पला बढ़ा और वही मेरी ज़मीन है। अलविदा। - आदित्य निगम]
एक ज़माना हुआ हिन्दी से जूझते हुए। यह दीगर बात है कि हिन्दीवालों को इसकी ख़बर तक नहीं। हो भी क्यों? आप बेचते ही क्या हैं?
िन्दी ख़ित्ते में पैदा हुए, पले-बढ़े और इसी आबोहवा में उम्र बिता दी मगर फिर भी, हुज़ूर, हमें हिन्दी की तमीज़ न आई। आज भी इस भाषाई क़िले का कोई न कोई पहरेदार, किसी न किसी ‘अशुद्धि’ को लेकर टोक ही देता है। मगर अक्सर ‘हिन्दी सप्ताहों’ और पखवाड़ों के दौरान जब बैंकों की दीवारों पर लिखी वो इबारतें देखता हूँ जो ग्राहकों को ‘चेक हिन्दी में भरने’ की दावत दे रही होती है, तो थोड़ी बहुत तसल्ली ज़रूर हो जाती है। लगता है कि मैं अकेला नही हूँ। चलिए, हमें तो हिन्दी न आई, मगर बाक़ियों को क्या हो गया? वे क्यों हिन्दी में एक चेक तक नहीं भरते? क्यों इस तरह उनका आह्वान करना पड़ता है? ख़ुद अपनी ज़बान से यह बेदिली कैसी? क्या हुआ उस भाषा को जो हम सब की राष्ट्रीय अस्मिता को परिभाषित करने की महत्वाकांक्षा लेकर मैदाने-जंग में उतरी थी? पिछले सौ-सवा- सौ सालों में कितनों को धराशायी किया इस हिन्दी के रणबाँकुरों ने! क्यों आज वह अपनों से ही इस तरह कट-सी गई है कि उसे इस तरह न्योते बाँटने पड़ रहे हैं? ऐसे ही उलझे हुए सवालों से पिछले सालों में कई बार रूबरू होना पड़ा है, लगातार अपने बरतने लायक़ एक ज़बान की तलाश करते हुए।
बात पुराने ज़माने की है। एक पैसा और पाँच पैसे के सिक्के चला करते थे उन दिनों। चवन्नी में चारमीनार सिगरेट का पैकेट आ जाया करता था। जी, हमारी नौजवानी के दिन। 1970 का वह दौर जो उन दिनों तो एक अलग ही मायने रखा करता था। दुनिया को बदल डालने की ख़्वाहिश, इंक़लाब का जुनून हम सब के सर पर सवार था। चारू मजुमदार का आह्वान था और हममें उनके नक़्शे-कदम पर चल कर एक नई दुनिया बनाने की तमन्ना। बस फिर क्या था? कमर कस कर कूद पड़े थे मैदान में। लेकिन ख़ुदा का लाख शुक्र है कि जल्द ही यह समझ में आ गया कि इंक़लाब चंद जाँबाज़ लोग नहीं, अवाम किया करती है। और अवाम है कि सोई पड़ी है। उसे इस बात का कोई इल्म ही नहीं कि इतिहास ने उसके कँधों पर कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी डाल रखी है। लिहाज़ा अब यह हमारा, इतिहास के कारिंदों का, नए ज़माने के हरकारों का काम हुआ कि सोती हुई जनता को जगाएँ। उसे उसकी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी का अहसास दिलाएं।
तो क़िस्सा यहाँ से शुरू होता है। इस मुई सोई हुई जनता को कैसे जगाया जाए? ज़रूरत है उससे मुख़ातिब होने की। तो फिर परचे निकालिए, मीटिंगें कीजिए, जलसे-जुलूस आयोजित कीजिए। यहीं से शुरू होती है उत्तर-औपनिवेशिक दर्द की एक लम्बी दास्तान। मुख़्तसर में कहूँ तो तमाम उत्तर-औपनिवेशिक समाजों में हम-जैसा एक बड़ा तबक़ा है जो, अगर एलबर्ट मेम्मी या फ़्रान्ज़ फ़ानों के शब्दों में कहा जाए, तो सांस्कृतिक रूप से अपाहिज है। वह अपनी भाषा और उसकी सांस्कृतिक ज़मीन से कट चुका है। वह अंग्रेज़ी या फ़्रांसीसी में बोलने और लिखने-पढ़ने के लिए अभिशप्त है। उत्तर-औपनिवेशिक दुनिया का बुद्धिजीवी हमेशा एक सांस्कृतिक स्किट्ज़ोफ़्रेनिया में जीता है। यह हमारी नियति है। ख़ासकर रैडिकल बुद्धिजीवियों की – जो अपने कमरों में बैठ कर मनन-चिंतन करने की बनिस्बत दुनिया को बदलने की तमन्ना रखते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों को हमेशा अवाम से मुख़ातिब होने में दिक़्कतें पेश आतीं हैं। उन्हें हर वक़्त इस संवाद के लिए ज़बान तलाशनी होती है। अक्सर बनानी होती है। और नेहरूई ज़माने के ‘थ्री लैंग्वेज फ़ॉर्मूला’ से निकले हम लोग तो किसी भी भाषा के लायक़ नहीं रह गए थे। हमें तो एक बरतने लायक़ भाषा तलाशने के लिए कहीं ज़्यादा मशक्क़त करनी पड़ी थी।
शुरू में तो भाषा की इस कमज़ोरी को मैं अपनी ही ख़ामी मानता रहा मगर आगे चलकर यह अहसास हुआ कि दरअसल यह एक आम दशा है। हिन्दी में चेक ज़्यादातर हिन्दीभाषी भरना नहीं जानते। लेकिन मेम्मी और फ़ानों की समस्या तो कमोबेश हर भारतीय भाषा पर लागू होती है – बांगला, मलयालम, तमिल, मराठी आदि। हिन्दी की दिक़्क़त एक और दर्जा ऊँची है, जिसका ज्ञान मुझे आगे चलकर हुआ।
तो हुज़ूर, जनता से मुखातिब होने का सिलसिला परचों से शुरु हुआ। दिल्ली में होने के कारण हिन्दी में परचे लिखने का काम पहले युनिवर्सिटी में और फिर बस्तियों और यूनियनों के मज़दूरों में शुरू हुआ। इलाक़ों और यूनियनों में तो वाचिक परम्परा का ज़ोर ज़्यादा था – लिहाज़ा सीधे-सीधे बोलना अक्सर ज़्यादा ज़रूरी हो जाता था। स्कूल में सीखी गई हिन्दी मैं जब भी बोलने की कोशिश करता तभी मुझे ऐसा लगता जैसे लोग मेरी तरफ़ कुछ इस अंदाज़ में देख रहे हैं गोया मैं सीधे चाँद से उतर कर आया हूँ। अक़्सर मुझे ऐसा लगता जैसे मानसिक रूप से वे उसी बीच कहीँ और विचरने चले गए हैं। अपनी बात कैसे कही जाए यह सवाल हमेशा बना रहता था। बाद में जब मुझे अकादमिक काम से जुड़ने का और उस क्षेत्र में हिन्दी की पाठ्य सामग्री तैयार करने का मौक़ा मिला तब तो यह दिक़्क़त इतनी बड़ी हो गई थी कि उसकी तुलना में मुझे ऐसा लगने लगा था कि ‘वो दिन भी क्या दिन थे’ – सियासत करते हुए जैसे कभी ऐसी दिक्क़तें सामने ही नहीं आईं। मगर अब सोचता हूँ तो लगता है कि वो दिक़्क़तें दोनों अवस्थाओं में थीं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि सियासत करते समय विचारधारात्मक घुट्टी पिलाने वाली बैठकों में यह परेशानी ज़्यादा पेश आती थीं, रोज़ाना के कामकाज में उतना नहीं।
बहरहाल, एक अर्थ में मेरी हिन्दी ऐसे ही तजुरबों के बीच बनी – लगातार शब्द टटोलते रहने के बीच, कभी फ़िल्मी गानों का सहारा लेकर, तो कभी अपने बस्तियों के साथियों द्वारा इस्तेमाल किए गए अल्फ़ाज़ ध्यान से सुनकर। तब मैंने पाया कि एक बहुत बड़ा शब्द-भंडार है जो इधर-उधर बिखरा पड़ा है, मगर जिसे हमारी स्कूली हिन्दी से जलावतन कर दिया गया है। ऐसा क्यों हुआ इसका हमें कोई अंदाज़ा नहीं था। बहुत साल बाद चलकर यह अहसास हुआ कि ये ऐसे शब्द थे जो हिन्दी के एक ऐसे अतीत की याद दिलाते थे जिससे निजात पाने के लिए हमारे रणबाँकुरों ने सौ साल से ज़्यादा तक भाषा को मैदाने-जंग में बदल कर रख दिया था। कभी-कभी ऐसा लगने लगा था जैसे हिन्दी और उसके योद्धाओं ने उर्दू का कोई नुक़सान किया हो न हो, ख़ुद अपने पैरों पर तो कुल्हाड़ी मार ही ली है। ख़ुद को पूरी तरह अपंग बना लिया है।
इस ज़माने में मैं दिल्ली नगर निगम के पानी के महकमे की यूनियन में काम किया करता था। उस ज़माने में इस महकमे का नाम था ‘दिल्ली जल प्रदाय व मल व्ययन संस्थान’। हमारी यूनियन के सदस्य अमूमन अनपढ़ बेलदार हुआ करते थे जिन्हें मैंने पाँच साल में कभी उस संस्थान का नाम लेते नहीं सुना। यह महकमा उन के लिए हमेशा ‘वाटर सप्लाई’ ही रहा। वाटर सप्लाई की यूनियन में बिताए अपने पूरे वक़्त में मैंने किसी मज़दूर को ‘अधिशासी अभियन्ता’ या ‘कनिष्ठ अभियन्ता’ कहते नहीं सुना। हमेशा जे ई (जूनियर इंजीनियर) या ‘एकशन’ (एक्ज़िक्यूटिव इंजीनियर का लघु, मगर ‘अपभ्रंश’ रूप) ही इस्तेमाल किया जाता था।
उन दिनों का तजुरबा ताउम्र मेरे साथ रहे यही लाज़मी था। एक बात तो समझ में आ ही गई थी: राजभाषा कमेटियों और तमाम आचार्यों के सारे प्रयास ज़मीन पर उतरते ही औंधे मुँह गिरते हैं। उनका कोई ख़रीदार नहीं है। मज़े की बात यह है कि अपने हिन्दीदाँ दोस्तों से मैंने जब भी हिन्दी की दुरूहता का ज़िक्र किया तो उन्होंने मुझे ये समझाने की कोशिश की कि मेरा यह सवाल महज़ ‘अंगरेज़ीदाँ’ बुद्धिजीवियों के दुराग्रह का नतीजा है। उनका कहना था कि ऐसे बुद्धिजीवियों को ‘क्लिष्ट अंगरेज़ी’ से तो कोई ग़ुरेज़ नहीं होता मगर हिन्दी का सवाल उठते ही वे उसकी क्लिष्टता का मसला उठा देते हैं। मैं आज तक उन्हें यह समझा पाने में असमर्थ रहा हूँ कि ये सवाल अंगरेज़ीदाँ लोगों का नहीं, ख़ुद हिन्दी की पब्लिक का है। अगर एक निरक्षर बिहारी या गढ़वाली मज़दूर की ज़ुबान पर ‘वाटर सप्लाई’ ज़्यादा आसानी से चढ़ता है तो क्या इससे सोचने लायक़ कुछ सवाल पैदा नहीं होते?
ख़ैर, ज़िन्दगी का वह एक पड़ाव भर था। ख़त्म हुआ। अगला पड़ाव भी आ ही गया।
1990 से 1992 के दरमियान, सोलह साल राजनीतिक कार्यकर्त्ता के रूप में काम करने के बाद, मुझे इंदिरा गाँधी मुक्त (?) विश्वविद्यालय (इगनू) के राजनीतिशास्त्र विभाग में हिन्दी पाठ्य-सामग्री तैयार करने की ज़िम्मेदारी मिली। चलते-चलते यहाँ इस ‘मुक्त’ शब्द पर भी ग़ौर फरमाते चलें। अंग्रेज़ी के ‘ओपन युनिवर्सिटी’ का यहाँ ‘मुक्त विश्वविद्यालय’ के रूप में तरजुमा किया गया है। ग़ौरतलब है कि कि यहाँ ‘ओपन’ का आशय विश्वविद्यालय की मुक्ति या आज़ादी से नहीं बल्कि उन शिक्षार्थियोँ/ तालिब-इल्मों की ‘मुक्ति’ से है, जिन्हें औपचारिक शिक्षा के ज़रिए नहीं मिल सके। औपचारिकताओं के बन्द रास्तों की जगह ‘ओपन युनिवर्सिटी’ छात्रों को एक खुला रास्ता प्रदान करती है। इस अर्थ में इसे ‘खुला’ विश्वविद्यालय कहना ज़्यादा मुनासिब होता।
जो परेशानी यहाँ ‘मुक्ति’ से शुरू हुई वही परेशानी पाठ्य सामग्री तैयार करते समय भी हमारा पीछा करती रही। यह परेशानी दो स्तरों पर थी या यूँ कहिए कि दो तरह की थीं। पहली, हिन्दी के एक अनुवाद की भाषा में तब्दील हो कर रह जाने की थी, जिसके चलते अभी भी लगातार हम, बकौल मेम्मी और फ़ानों, एक क़िस्म के स्किट्ज़ोफ़्रेनिया में जीते हैं। अंग्रेज़ी में सोचते हैं और फिर हिन्दी में तरजुमा करते हैं। इस समस्या का अपना एक लम्बा इतिहास है जो उत्तर औपनिवेशिक दशा के साथ साथ हिन्दी के ख़ास इतिहास से भी ताल्लुक़ रखता है और जिसका ताल्लुक़ इस बात से भी है कि शुद्धता के अपने आग्रह के चलते हिन्दी ने अपने शब्द-भंडार को बेइन्तहा दरिद्र कर दिया है। लिहाज़ा, जैसा कृष्ण कुमार कई बार कहते हैं, हम अंग्रेज़ी के ‘वॉटर कैचमेंट एरिया’ के लिए यह मान कर शब्द ढूँढने निकलते हैं कि हमारी अपनी ज़बानों में ऐसा कोई शब्द हो ही नहीं सकता। नतीजतन, ‘जल सम्भरण क्षेत्र’ जैसे मनगढंत शब्द ईजाद किए जाते हैं, जबकि ‘आगोर’ (राजस्थान) या ‘आगार’ (उत्तर प्रदेश) जैसे शब्द पहले ही हमारी भाषाओं में प्रचलित हैं। ज़ाहिर है कि एक मानक शब्दावली तैयार करने के सम्बन्ध में हम तथाकथित बोलियों से कोसों दूर रहना चाहते हैं और उर्दू से तो तौबा-तौबा। इस आग्रह का असर सिर्फ़ उर्दू या बोलियों से आने वाले शब्दों पर ही नहीं पड़ता, कुल मिलाकर यह एक अनुवादी मानसिकता तैयार कर देता है जो हर तरफ़ असर डालता है। इस तरह ‘नैशनल हाईवे’ के लिए ‘राजमार्ग’ जैसे माकूल शब्द उपलब्ध और प्रचलित होने के बावजूद ‘राष्ट्रीय उच्चमार्ग’ जैसे अजीबो-ग़रीब शब्द गढ़े जाते हैं।
मगर इस आम दिक़्क़त के अलावा एक खास – दूसरी – दिक़्क़त भी है जो अकादमिक या बौद्धिक काम से, यानि ज्ञान के उत्पादन के कारोबार से ताल्लुक़ रखती है। यह मसला है वैचारिक अवधारणाओं का मसला। अवधारणागत शब्द महज़ शब्द नहीं होते। एक मायने में वे तकनीकी पद होते हैं। ऐसे शब्दों के बिना ज्ञान का कोई भी कारोबार सम्भव नहीं है। उन दिनों इगनू में पाठ्य सामग्री अँगरेज़ी में तैयार की जाती थी (मेरा ख़याल है कि आज भी ऐसा ही है)। फिर फ़्रीलांस अनुवादकों से इनका हिन्दी में अनुवाद कराया जाता था। अलग-अलग अनुवादक अपने-अपने हिसाब से शब्दों का तरजुमा कर दिया करते थे। नतीजतन, एक ही शब्द अलग-अलग जगह अलहदा ढंग से अनूदित होता था। यानि पाठ्य सामग्री में एक ढंग से और इम्तहान के परचे में एक और ढंग से। ग़नीमत समझिए कि किसी छात्र ने यह दावा नहीं किया कि फ़लां सवाल ‘आउट ऑफ़ कोर्स’ है। चूँकि हमारे पास कोई एक टकसाली शब्दावली नहीं थी इसलिए इसका दोष अनुवादकों को देना ठीक न होगा। यह स्थिति आज भी किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय में देखने को मिल सकती है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पारम्परिक युनिवर्सिटियों में चालू कुंजियां मिल जाया करती हैं जिनसे छात्रों का काम जैसे तैसे चल जाता है। मगर इन विश्वविद्यालयों में भी समाज विज्ञान के विषय पढ़ाने वाले हमारे दोस्तों को आज भी परीक्षा की सुबह जाकर हिन्दी का अनुवाद ‘चेक करना’ और छात्रों को पढ़ कर सुनाना पड़ता है और यह हिदायत देनी पड़ती है कि जवाब देने से पहले अंगरेज़ी के शब्द ज़रूर देख लें: कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी बेचारे अनुवादक ने ‘ईकोफ़ेमिनिज़्म’ का तरजुमा ‘आर्थिक नारीवाद’ कर दिया हो (ऐसा वास्तव में हो चुका है)? ऐसा हर साल होता है – होता आया है बिलानागा, साठ साल से। अफ़सोस, हिन्दी के ख़ैरख़्वाहों ने सिवाय नारे लगाने के और कुछ नहीं किया। और नारों से बात बननी होती तो कभी की बन गई होती।
समस्या को थोड़ा गहराई से समझने के लिए मिसाल के तौर पर ‘ऑथॉरिटी’ शब्द को लें। एक मानक शब्दावली के अभाव में इसका अनुवाद ‘अधिकार’ के रूप मे किया जा सकता है और ऐसा करना क़तई ग़लत न होगा। लेकिन राजनीतिक व सामाजिक थ्योरी के संदर्भ में यह शब्द अपने आप में कोई मायने नहीं रखता है। इसे अपने आसपास के शब्दों के साथ रिश्ता बनाकर अपनी सार्थकता खोजनी होती है। अब अगर इसके नज़दीक का एक और शब्द ‘राइट’ लें तो पाएंगे कि इसके लिए भी हमारे पास ‘अधिकार’ शब्द ही है। वैसे फ़र्क़ करने के लिए ‘ऑथॉरिटी’ के लिए ‘प्राधिकार’ जैसा एक मनगढंत शब्द इस्तेमाल किया जाने लगा है जो वृहत् हिन्दी कोश जैसे कोशों मे तो मिलेगा ही नहीं और जहाँ मिलेगा भी वहाँ उसके अर्थ ‘एकाधिकार’ (इजारेदारी) से लेकर ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) तक फैले मिलेंगे। राजनीतिक व सामाजिक थ्योरी के संदर्भ में मैक्स वेबर के बाद से ‘ऑथॉरिटी’ का एक और ख़ास अर्थ बन गया है। वेबर ने इस शब्द का इस्तेमाल ‘जायज़ सत्ता’ (यानि सत्ता+वैधता) को रेखांकित करने के लिए किया था। शुद्धता के हमारे दुराग्रह के चलते अब हमारे पास इन तमाम तरह के पदों के लिए शब्द ही क्या बचे हैं? इधर आपके पास शब्दों का अभाव है और उधर, थोड़ी दूर पर, हक़, इख़्तियार, हुकूमत, हाकिम, महकूम आदि जैसे अनगिनत शब्द टहल रहे है। हिन्दी और उर्दू की आशनाई आप के पीठ पीछे चलती ही आई है। आपकी निगाह हटी नहीं कि उनका मिलन शुरू। अब इन्हें वैध रूप से दाखिला दे दें तो आपकी मुरझाई हुई हिन्दी मस्ती में झूम उठे।
ज़ाहिर है कि भाषा का थोड़ा सा उदारीकरण करने भर से हमारा शब्द भंडार कई गुणा बढ़ जाएगा। मगर इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि ऐसे अवधारणागत शब्द अपने आप में कोई मायने नहीं रखते। उनके पीछे होती है एक पूरी दुनिया, एक लम्बी बहस, एक कलाम या विमर्श, एक ‘अर्थतंत्र’। अर्थों के इस तंत्र में सिमटा होता है एक पूरा विचार जगत। इन शब्दों के अर्थ सिर्फ़ शब्दों में निहित नहीं होते (वैसे यह बात सभी शब्दों के बारे में कही जा सकती है), उन्हें अर्थ मिलता है थ्योरी के उस ढाँचे में जिनमें उनकी रिहाइश होती है। वहाँ अपनी बिरादरी के अन्य शब्दों के साथ रिश्ते में ही वे अर्थ पाते हैं। उसे बरतने वाले समाज वैज्ञानिकों के बीच भी उसका एक स्वीकृत अर्थ बनने लगता है। और तभी वह उस थ्योरी-विशेष के ढाँचे से आज़ाद होकर एक व्यापक मानी इख़्तियार कर लेता है। बहस मुबाहिसे का और थ्योरी-निर्माण का पूरा संदर्भ ही ग़ायब रहे और हम महज़ अनुवाद से शब्द गढ़ते चले जाएँ यह संभव नहीं। आज आप एक शब्द गढ़ें तो कल किसी नई थ्योरी के असर में उसके मानी पूरी तरह बदल सकते हैं।
मिसाल के तौर पर वेबर के ही इस पद ‘ऑथॉरिटी’ को लें। हमने ज़िक्र किया था कि इसके आशय ‘वैध सत्ता’ से हैं। ज़ाहिर है कि सत्ता की वैधता का सवाल ‘सब्जेक्ट’ (इसके लिए ‘कर्त्ता’ शब्द ग़लत होगा) की ऐसी संकल्पना से जुड़ा है जो सत्ता को मंज़ूरी या वैधता प्रदान करता है। वेबर से मिशेल फूको तक आते आते यह धारणा इस क़दर बदल जाती है कि उस सब्जेक्ट को अब एक खुद-मुख़्तार शै के रूप में देखना ही मुमकिन नहीं रह जाता है, जो दुनिया को उसका अर्थ प्रदान करता या करती है, या जिसके इर्द-गिर्द सत्ता और समाज वजूद में आते हैं। अब सत्ता को वैधता की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि सत्ता ही उस सब्जेक्ट को गढ़ती है जिसकी सहमति/ असहमति के ज़रिए उसके जायज़ या नाजायज़ होने का सवाल खड़ा होता है। अनुवाद की कला को हम कितना ही बेहतर क्यों न बना लें, ऐसी स्थितियों का जवाब अनुवाद में नहीं मिलेगा।
लिहाज़ा सवाल हिन्दी में मौलिक चिंतन का है जो साहित्येतर विषयों में तक़रीबन नदारद है। बात अनुवाद और मौलिकता की चली तो यहाँ एक बात स्पष्ट कर देनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि हम हिन्दी में मौलिकता के ऊपर अनवाद को तरजीह देते हैं। साच तो यह है कि हम अनुवाद को भी एक दोयम दर्जे का काम समझते हैं। ‘अनुवादी मानसिकता’ दरअसल अनुवाद के काम को हीनभाव से देखने का ही नतीजा है। या यूँ कहिए कि यह मानसिकता हिन्दी के मर्ज़ का दूसरा पहलू है: जो मौलिकता का क़ायल है वही अनुवाद की अहमियत को समझ सकता है, वही उसे एक मौलिक काम के रूप में देख सकता है। हम में से कोई भी, चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो, स्वयम्भू नहीं है। हो भी नहीं सकता। हमारी सारी सर्जनात्मकता, दुनिया के अन्य हिस्सों में, अपनी अपनी विधाओं में हो रहे नए नए प्रयोगों के साथ संवाद में उभर कर सामने आती है। और इन सब से हमारा साबिका अनुवाद ही के ज़रिए होता है। मगर ऐसा कर पाना तभी संभव है जब हम ख़ुद अनुवाद को फ़ौरी और कामचलाऊ चीज़ों तक सीमित रखने के बजाय एक मौलिक काम के रूप में देखें – एक ऐसे काम के रूप में जिसके ज़रिए ही संस्कृतियों और तहज़ीबों में संवाद मुमकिन है। तभी जाकर हम सही मायने में मौलिक काम भी ढंग से कर पाएंगे।
ऐसा न कर पाना ही शायद वह वजह है जिसके चलते इस पूरे इलाक़े में ज्ञान के पैदावार का पूरा कारोबार काफ़ी हद तक औपनिवेशिक उत्पादन की तर्ज़ पर होता आया है और हो रहा है। ज्ञान की अपनी एक ‘अर्थव्यवस्था’ होती है जो वास्तविक जीवन की ज़मीन से अपना ‘कच्चा माल’ बटोरती है, अपने अकादमिक कारख़ानों में बौद्धिक श्रम के ज़रिए तैयार माल पैदा करती है। फिर वह सरकुलेशन के लिए बाज़ार में छोड़ दी जाती है। हमारे यहाँ यह अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक ज़माने की अर्थव्यवस्था (इसे कलोनियल मोड ऑफ़ प्रोडक्शन कहा जा सकता है) जैसी है। उस ज़माने में हमारे जैसे मुल्कों से कच्चा माल इंग्लैड वगैरह जाता था और कारखानों से तैयार माल की शक्ल में फिर एक बार हमारी ही मंडियों में बिकने के लिए आया करता था। आज ज्ञान के पैदावार का कमोबेश यही तरीक़ा जारी है। इस इलाक़े का सामाजिक जीवन वह ज़मीन है जहाँ से कच्चा माल बटोरा जाता है। अंगरेज़ी में वह तैयार होकर आता है – थ्योरी की शक्ल में – और फिर हिन्दी का मुलम्मा चढ़ा कर उसे बाज़ार में छोड़ दिया जाता है। इस स्थिति से उबरने के लिए अनुवाद और ‘मौलिक काम’ दोनों साथ साथ करने की ज़रूरत है। और ऐसा करते समय शायद इस बात से भी बाख़बर रहने की ज़रूरत है कि भाषाई क़िलों पर पहरेदार तैनात कर के यह काम न हो पाएगा। ज़रूरत होगी भाषा के उदारीकरण की, चारों तरफ़ से नए शब्द ढूँढने और बटोरने की। और यह ऐन मुमकिन है कि हर अंगरेज़ी शब्द का हमें कोई माकूल हिन्दी पर्याय न मिले। ऐसा समृद्ध से समृद्ध भाषा में भी होता है। मिसाल के तौर पर, जर्मन भाषा के हेगेलीय शब्द ‘आउफ़ेबुंग’ को लें। कुछ कोशिशों के बाद अब अंगरेज़ी में इसका अनुवाद करने की कोशिश ही छोड़ दी गई है। अब इस जर्मन शब्द को ही अपना लिया गया है। ऐसे अनगिनत श्ब्द, खासकर फ़लसफ़ाई अनुशासनों में मिलेंगे। यह हमारी भाषाई ग़ुरबत का नहीं, महज़ अलग अलग सांस्कृतिक व बौद्धिक परिवेशों के फ़र्क़ का द्योतक है।