कल टूटा था, आज बँटा हूँ।
कहना न होगा मैं क्या हूँ।।
चले चलो! चरैवेति! आगे बढ़ो, यार! मूव ऑन! कितना आसान है ये सब कहना, कितना मुश्किल है उस पर अमल करना, जो कि अक्सर हर महान सूक्ति के साथ होता है : सत्यम् वद, धर्मं चर का हश्र हम जानते हैं! अपने एक ग़मज़दा दोस्त को भी फ़ैसला सुनने के बाद मैंने यही नसीहत दी थी : यार इमोशनल मत होओ! 6 दिसंबर 1992 को शहीद बाबरी मस्जिद, जिसे अलग-अलग लोगों द्वारा रामजन्म भूमि या फिर विवादित ढाँचा कहा गया, अब वापिस विभाजित है। ठीक तो है, जिस विवाद को समाज हल नहीं कर पाता, जिसे राजनीति सुलझाने में घबड़ाती है, उसे अगर उच्च न्यायालय के तीन मिले-जुले न्यायाधीशों के खंडपीठ ने तीन हिस्सों में बाँट दिया तो सहज ज्ञान तो बोमन ईरानी के रिक्शेवाले के शब्दों में यही कहेगा न : ‘किसी को तो अक़ल आई!’
मैं भी अगर अपने यादों के जीवित गाँव के ज़िन्दा नुमाइंदे के रूप में पंचायती अवतार में आ जाऊँ तो ख़ुद को उसी रिक्शे वाले के साथ खड़ा पाता हूँ। पर किसी और कोने से की गई ‘भूल जाओ’ की हर माँग कलेजे का एक हिस्सा काट लेती है। कलेजे को काट कर न्याय की कोई स्वीकृति संभव है? शायद पंचायत में ऐसा हो भी जाता पर मैं क्या करूँ, मेरे प्यारे अलगू चौधरी और जुम्मन शेख़ के
बीच में राष्ट्र आ गया। प्रेमचंद के आदर्शवादी यथार्थवाद के बावजूद पंचायत इतना गिरा हुआ शब्द हो गया है कि लोग चलते-फिरते उसे गलियाने लगे। शायद ठीक ही!
लेकिन जिस देश की आज़ादी का भविष्य पंचायती फ़ैसले की बुनियाद पर बना हो, जहाँ आज़ादी
के बाद की ख़ूँरेज़ी कई मौक़ों पर गांधी की पंचायती गुहारों से रुकी या टली हो, जहाँ आज भी
पंचायतें अंतर्जातीय शादियाँ करने पर प्रेमियों का क़त्ल या उन्हें ज़लावतन कर देती हैं, जहाँ मनरेगा की मज़दूरी बाँटने के लिए अभी-भी ग्रामीण निगरानी समितियों को उपयुक्त इकाई माना जाता हो, वहाँ पंचायती शब्द का ऐसा उपहास कुछ हद तक समझ में आता है पर किंचित परेशान भी करता है।
गोकि मेरी निजी ज़िंदगी और मेरे विश्वासों को इससे रत्ती-भर फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वहाँ पर क्या बनता है, क्योंकि मेरा जो था वह तो 6 दिसंबर को ही टूट गया था।
उसके बाद तो लोगों ने अपनी पार्टियों के बहुमत बनाये, सरकारें बनाईं। होशियारी से भूल गए थे पर अब तो लगता है कि मंदिर भी बना लेंगे, कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं। अठारह साल गुज़र चुके हैं, हम कितना आगे बढ़ चुके हैं। अब हम आम आदमी – ठेले-खोमचेवालों – को सड़कों से भगाकर उसे राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन पर आभासी तौर पर देखते-दिखाते और गर्वान्वित होते हैं: देखिए हमारी
सांस्कृतिक विविधता – रंगबिरंगा सुपरपावर परजातंतर! हमारी जनजातियाँ कितना अच्छा नाचती हैं, मगर ये नक्सलवादी उन्हें मौक़ा ही नहीं देते, बंदूक़ थमा देते हैं। नगा-मणिपुरी वेशभूषा कितनी
सजती है वेदमंत्रों और सूर्यनमस्कार के बीच – काश ये दो कौड़ी के बुद्धिजीवी या बाहरी ताक़तें उन्हें जीने की मोहलत तो दें। फ़ैसला आने के बाद भी रहमान कितना अच्छा गाता है: जय हो! लेटअस मूव ऑन!
इस सूरते-हाल में कौन हैं वे लोग जो मूवियाना नहीं चाहते हैं, फँसे रहना चाहते हैं अपने पुराने साँचों-खाँचों में? चंद इतिहासकार जो कभी भी इस देश के नहीं रहे। ये सहमत वाले जिनसे हम हमेशा असहमत रहे हैं! और ये अल्ट्रा-सेक्युलरिस्ट – (ये अपेक्षाकृत नया शब्द है, पचने में वक़्त लेगा) – हमें तो असम के अलगाववादी दिनों से ही अल्ट्रा-फल्ट्रावादियों से एलर्जी रही है। हू केयर्स! जीडीपी देखो और चले-चलो, कोई साथ न दे तो भी इन्वेस्ट करो और एकला चलो! कारवाँ तो बन ही जाएगा।
देखो तो कितने-सारे लोग चलने पर उतारू हैं!
मज़ेदार बात होती अगर इतनी दुखद न होती कि विभाजन के बाद भी भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रपति ने यही कहा था – हमें आप लोगों के कृत्य ने दुनिया में बदनाम कर दिया है। लेट अस फ़ॉरगेट ऐण्ड मूव ऑन! कुछ करो मत, अपने-आप इधर इतनी गरम हवाएँ चलेंगी कि जिन्हें झुलसना है वे झुलसने लगेंगे, और सब-कुछ ख़ुद-ब-ख़ुद ठीक हो जाएगा। लौहपुरुष ने कुछ ऐसा ही कहा था लखनऊ में हिन्दुओं से कि मुसलमान त्राहिमाम् करते हुए गांधीजी के पास आए थे। कुछ हुआ नहीं, बस
एक फ़िल्म बनी ‘गरम हवा’ नाम से, कई दहाइयों बाद!
मैं भी चल देता अगर कुछ लोगों ने इस फ़ैसले को संख्यात्मक जनवाद से प्रेरित अपने कपोलकल्पित
इतिहास की तस्दीक़ न मान लिया होता। मैं तो चल ही देता अगर संघ-परिवार में से किसी ने जीत
के मौक़े पर भी फ़क़त इतनी दरियादिली दिखायी होती कि कह उठते : हम मस्जिद भी वहीं बनायेंगे! मैं इसलिए भी चल देता – और हर कोई चलता ही रहता है कोई कहे न कहे, क्योंकि बक़ौल राही
मासूम रज़ा, बलवे की कहानियाँ ख़त्म हो जाती हैं, लेकिन ज़िन्दगी चलती रहती है – कि उसको
चलना है।
लेकिन मुझे इसका भी एहसास है कि हर बलवा मेरे पुराने ज़ख़्म ताज़ा कर देता है! हर बलवा मुझे
अपने घर को दो पग पीछे समेट लेने को बाध्य कर देता है। और मुझे अपने ही घर में लगातार
सिमटते-सिकुड़ते जाना मंज़ूर नहीं। मैं सुप्रीम कोर्ट जाऊँगा, इसलिए नहीं कि मुझे पता है कि मेरे पक्ष में फ़ैसला होगा, बल्कि सिर्फ़ ये देखने के लिए कि मेरे घर की चौहद्दियों को सिकोड़ने की साज़िश कहाँ तक फैली है। और कहाँ तक फैलेगी। क्योंकि तैंतीस करोड़ देवी-देवता और उनके क़ानूनी लल्ला अगर अपना-अपना हिस्सा माँगने चल देंगे तो मेरा निराकार अल्लाह तो बेघर हो ही जाना है!
पर तब तक या उसके बाद भी मैं तो चलूँगा ही, रुकूँगा नहीं, ख़ातिर जमा रखें! किसके साथ, ये
नहीं बता सकता।
“…और मुझे अपने ही घर में लगातार
सिमटते-सिकुड़ते जाना मंज़ूर नहीं”। बहुत उम्दा।