क़ाफिला या कारवाँ – अरबी ज़ुबान से आया हिन्दी शब्द। क़ाफ़िला यानि एक अंतहीन सफ़र के मुसाफ़िर। हमसफ़र। या फिर जुलूस, ख़ानाबदोशों के समूह, इंसानों के झुंड, या फिर आधुनिक समाज का वह सर्वव्यापी किरदार जिसे कुबूल करने से आधुनिक मन ग़ुरेज़ करता है – शरणार्थी, हमेशा समुहों में सफ़ररत। अपने वतन या देस से बेदखल – कहीं सरमायादारी की हवस के चलते तो कहीं आधुनिक विकास के चलते, जिसकी लोगों को गिनने, उन्हें ख़ानों में बांटने, उनकी जगह बाँधने, और उन्हें ठिकाने लगाने की ख़्वाहिश ने पिछली दो सदियों में अनगिनत रिफ़्यूजी पैदा किए हैं।
क़ाफ़िला अकादमीशियनों, कार्यकर्त्ताओं, अखबारनवीसों, कलाकारों व लेखकों का एक समूह है जो आज की दुनिया के मुख़्तलिफ़ सवालों पर बहस-मुबहिसे के लिए एक क्रिटिकल जगह बनाने की ख़्वाहिश रखता है। यह ख़्वाहिश इस एहसास पर आधारित है कि आज की दुनिया में सार्वजनिक बहस-मुबाहिसे की तमाम जगहें कारपोरेट मीडिया निगल चुका है।