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सूनी राहों पर – बॉब डिलन के गीत की तर्ज़ पर

Posted in culture, politics on 18 अप्रैल 2008 by Aditya Nigam

1980 के दशक के दौरान बॉब डिलन के इस मशहूर गाने का तरजुमा परचम मंडली के लिए किया गया था। इधर दो दशक से भी ज़्यादा समय ग़ुज़र जाने के बाद अपने चंद रैडिकल युवा साथियों के आग्रह पर उस पर दोबारा निगाह डालने पर लगा इस पर काफ़ी काम की ज़रूरत है। लिहाज़ा कुछ और सफ़ाई कर के छाप रहा हूँ। लोकेश और नवीन को इसके लिए ख़ास तौर पर शुक्रिया।
(बॉब डिलन के गीत ‘द आन्सर इज़ ब्लोइं इन द विंड’ से प्रेरित)

सूनी राहों पर कोई कब तक चले
इससे पहले वो इंसाँ कहलाए?
कितने सागर कोई फ़ाख़्ता उड़े
इससे पहले कि वो चैन पाए?
बारूद की बू फैली हर इक ओर
कैसे यारों अमन आने पाए?
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा
फ़िज़ाओं में जवाब मिलेगा।

कितने बरस कोई पर्वत टिके
इससे पहले कि वो मिट जाए?
कितने युगों तक करें इंतज़ार
जब आज़ादरूहों की उठेगी फ़रियाद?
कब तक आख़िर कोई मुँह फेर कर
हक़ीक़त से दामन बचाए?
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा
फ़िज़ाओं मे जवाब मिलेगा।

जंग के बादल हैं फैले हर सू
अँधेरों में ढका आसमान
और तबाही मची है घर घर में
आँखें अपनी खोलो ज़रा
औ’ कितनी और लाशों के अम्बार लगें
इससे पहले कि आप जान पाएँ?
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा
फ़िज़ाओं में जवाब मिलेगा।

मूल अंगरेज़ी के बोल इस तरह हैं:

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हिन्दी के वर्जित प्रदेश में…

Posted in bad ideas, culture, debates, politics with tags , , , , on 18 अप्रैल 2008 by Aditya Nigam

[यह लेख कुछ अरसा पहले वाक् पत्रिका के लिए लिखा गया था - पुराने दोस्त सुधीश पचौरी के इसरार पर। जब यह लेख लिख रहा था तब से अब तक हालात कुछ बदल चुके हैं। इसे लिखते वक़्त तक भी मुझे यह गुमान था कि शायद एक रोज़ मैं हिन्दी के क़िलानुमा परिसर में घुस पाने क़ामयाब हो पाउंगा। हज़ार पहरों में घिरे इस क़िले में एक रोज़ ज़रूर दाखिल होने का मौक़ा मिलेगा। मगर इधर कुछ समय से ऐसा लगने लगा है कि यह क़त्तई मुमकिन नहीं है। हिन्दी के पहरेदार ऐसा कभी न होने देंगे। लिहाज़ा अब इस क़िले में घुसने की कोशिश छोड़ कर हिन्दुस्तानी के खुले और बे-पहरा मैदान में, खुली हवा में टहलना चाहता हूँ। कह देना चाहता हूँ पहरेदारों से कि मैं आप के मुल्क का बाशिंदा नहीं हूँ। मैं एक लावारिस मगर आज़ाद ज़ुबान में पला बढ़ा और वही मेरी ज़मीन है। अलविदा। - आदित्य निगम]

एक ज़माना हुआ हिन्दी से जूझते हुए। यह दीगर बात है कि हिन्दीवालों को इसकी ख़बर तक नहीं। हो भी क्यों? आप बेचते ही क्या हैं?
िन्दी ख़ित्ते में पैदा हुए, पले-बढ़े और इसी आबोहवा में उम्र बिता दी मगर फिर भी, हुज़ूर, हमें हिन्दी की तमीज़ न आई। आज भी इस भाषाई क़िले का कोई न कोई पहरेदार, किसी न किसी ‘अशुद्धि’ को लेकर टोक ही देता है। मगर अक्‍सर ‘हिन्दी सप्ताहों’ और पखवाड़ों के दौरान जब बैंकों की दीवारों पर लिखी वो इबारतें देखता हूँ जो ग्राहकों को ‘चेक हिन्दी में भरने’ की दावत दे रही होती है, तो थोड़ी बहुत तसल्‍ली ज़रूर हो जाती है। लगता है कि मैं अकेला नही हूँ। चलिए, हमें तो हिन्दी न आई, मगर बाक़ियों को क्या हो गया? वे क्यों हिन्दी में एक चेक तक नहीं भरते? क्यों इस तरह उनका आह्वान करना पड़ता है? ख़ुद अपनी ज़बान से यह बेदिली कैसी? क्या हुआ उस भाषा को जो हम सब की राष्‍ट्रीय अस्‍मिता को परिभाषित करने की महत्‍वाकांक्षा लेकर मैदाने-जंग में उतरी थी? पिछले सौ-सवा- सौ सालों में कितनों को धराशायी किया इस हिन्दी के रणबाँकुरों ने! क्यों आज वह अपनों से ही इस तरह कट-सी गई है कि उसे इस तरह न्योते बाँटने पड़ रहे हैं? ऐसे ही उलझे हुए सवालों से पिछले सालों में कई बार रूबरू होना पड़ा है, लगातार अपने बरतने लायक़ एक ज़बान की तलाश करते हुए।
बात पुराने ज़माने की है। एक पैसा और पाँच पैसे के सिक्के चला करते थे उन दिनों। चवन्‍नी में चारमीनार सिगरेट का पैकेट आ जाया करता था। जी, हमारी नौजवानी के दिन। 1970 का वह दौर जो उन दिनों तो एक अलग ही मायने रखा करता था। दुनिया को बदल डालने की ख़्‍वाहिश, इंक़लाब का जुनून हम सब के सर पर सवार था। चारू मजुमदार का आह्वान था और हममें उनके नक़्‍शे-कदम पर चल कर एक नई दुनिया बनाने की तमन्‍ना। बस फिर क्या था? कमर कस कर कूद पड़े थे मैदान में। लेकिन ख़ुदा का लाख शुक्र है कि जल्द ही यह समझ में आ गया कि इंक़लाब चंद जाँबाज़ लोग नहीं, अवाम किया करती है। और अवाम है कि सोई पड़ी है। उसे इस बात का कोई इल्म ही नहीं कि इतिहास ने उसके कँधों पर कितनी बड़ी ज़िम्‍मेदारी डाल रखी है। लिहाज़ा अब यह हमारा, इतिहास के कारिंदों का, नए ज़माने के हरकारों का काम हुआ कि सोती हुई जनता को जगाएँ। उसे उसकी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी का अहसास दिलाएं।

तो क़िस्सा यहाँ से शुरू होता है। इस मुई सोई हुई जनता को कैसे जगाया जाए? ज़रूरत है उससे मुख़ातिब होने की। तो फिर परचे निकालिए, मीटिंगें कीजिए, जलसे-जुलूस आयोजित कीजिए। यहीं से शुरू होती है उत्तर-औपनिवेशिक दर्द की एक लम्बी दास्‍तान। मुख़्‍तसर में कहूँ तो तमाम उत्तर-औपनिवेशिक समाजों में हम-जैसा एक बड़ा तबक़ा है जो, अगर एलबर्ट मेम्मी या फ़्रान्ज़ फ़ानों के शब्‍दों में कहा जाए, तो सांस्‍कृतिक रूप से अपाहिज है। वह अपनी भाषा और उसकी सांस्‍कृतिक ज़मीन से कट चुका है। वह अंग्रेज़ी या फ़्रांसीसी में बोलने और लिखने-पढ़ने के लिए अभिशप्त है। उत्तर-औपनिवेशिक दुनिया का बुद्धिजीवी हमेशा एक सांस्‍कृतिक स्किट्ज़ोफ़्रेनिया में जीता है। यह हमारी नियति है। ख़ासकर रैडिकल बुद्धिजीवियों की – जो अपने कमरों में बैठ कर मनन-चिंतन करने की बनिस्बत दुनिया को बदलने की तमन्ना रखते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों को हमेशा अवाम से मुख़ातिब होने में दिक़्कतें पेश आतीं हैं। उन्हें हर वक़्त इस संवाद के लिए ज़बान तलाशनी होती है। अक्सर बनानी होती है। और नेहरूई ज़माने के ‘थ्री लैंग्‍वेज फ़ॉर्मूला’ से निकले हम लोग तो किसी भी भाषा के लायक़ नहीं रह गए थे। हमें तो एक बरतने लायक़ भाषा तलाशने के लिए कहीं ज़्यादा मशक्क़त करनी पड़ी थी।

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चीन के मशालची और ज़माने की हवा

Posted in bad ideas, debates, leftwatch with tags , , , on 18 अप्रैल 2008 by Aditya Nigam

आदित्य निगम

नेपाल के चुनावी नतीजों के बारे में हिन्दुस्तान की सरकार भले ही कितना परेशान हो, कम-अज़-कम एक मसले पर माओवादियों के बहुत नज़दीक़ खड़ी दिखाई देती है। जिस तरह पूरा सरकारी तामझाम चीन की मशाल की हिफ़ाज़त में लगा दिया गया, उससे तो ऐसा ही गुमान होता है।

अलबत्ता, नेपाल के माओवादी नेताओं के बारे में हमें शायद इतना जल्दी किसी नतीजे पर नहीं पहुँचना चाहिए। मुमकिन है कि वे आज के चीनी नेताओं के उतने हामी न हों जितना माओ के हुआ करते थे। मगर इस बीच अपने देसी इंकलाबी भाइयों ने अपने नेपाली कामरेडों से कमान छीन ली और, बरस्ते फ़िदेल कास्त्रो के ग्रानमा अखबार, यह ऐलान भी कर डाला कि तिब्बत की आज़ादी की लड़ाई एक अमरीकी साज़िश है।

अभी कुछ ही हफ़्तों पहले हमारे जाँबाज़ों ने – जिसमें माकपा के नेता भी शामिल थे – एक आवाज़ में कोसोवो की आज़ादी को भी अमरीकी साज़िश का नतीजा बता दिया था। और जिन्हें याद होगा, कभी सोवियत संघ के पतन को भी अमरीकी साज़िश बताया गया था।

ख़ैर, साहब आप लोग ही बेहतर जानते होंगे। मुमकिन है कि ज़माने की हवा अमरीका की तरफ़ बह रही हो। यह तो ज़माने से सुनते आए हैं कि अमरीका ख़ुफ़िया तौर तरीक़ों से तख्ता-पलट आदि करवाता रहा है, मगर यह न मालूम था कि व्यापक जन-आंदोलन खड़ा करने में भी वह माहिर है। आप की लुप्त होती प्रासंगिकता की इससे बड़ी दलील और क्या हो सकती है?