[यह लेख कुछ अरसा पहले वाक् पत्रिका के लिए लिखा गया था - पुराने दोस्त सुधीश पचौरी के इसरार पर। जब यह लेख लिख रहा था तब से अब तक हालात कुछ बदल चुके हैं। इसे लिखते वक़्त तक भी मुझे यह गुमान था कि शायद एक रोज़ मैं हिन्दी के क़िलानुमा परिसर में घुस पाने क़ामयाब हो पाउंगा। हज़ार पहरों में घिरे इस क़िले में एक रोज़ ज़रूर दाखिल होने का मौक़ा मिलेगा। मगर इधर कुछ समय से ऐसा लगने लगा है कि यह क़त्तई मुमकिन नहीं है। हिन्दी के पहरेदार ऐसा कभी न होने देंगे। लिहाज़ा अब इस क़िले में घुसने की कोशिश छोड़ कर हिन्दुस्तानी के खुले और बे-पहरा मैदान में, खुली हवा में टहलना चाहता हूँ। कह देना चाहता हूँ पहरेदारों से कि मैं आप के मुल्क का बाशिंदा नहीं हूँ। मैं एक लावारिस मगर आज़ाद ज़ुबान में पला बढ़ा और वही मेरी ज़मीन है। अलविदा। - आदित्य निगम]
एक ज़माना हुआ हिन्दी से जूझते हुए। यह दीगर बात है कि हिन्दीवालों को इसकी ख़बर तक नहीं। हो भी क्यों? आप बेचते ही क्या हैं?
िन्दी ख़ित्ते में पैदा हुए, पले-बढ़े और इसी आबोहवा में उम्र बिता दी मगर फिर भी, हुज़ूर, हमें हिन्दी की तमीज़ न आई। आज भी इस भाषाई क़िले का कोई न कोई पहरेदार, किसी न किसी ‘अशुद्धि’ को लेकर टोक ही देता है। मगर अक्सर ‘हिन्दी सप्ताहों’ और पखवाड़ों के दौरान जब बैंकों की दीवारों पर लिखी वो इबारतें देखता हूँ जो ग्राहकों को ‘चेक हिन्दी में भरने’ की दावत दे रही होती है, तो थोड़ी बहुत तसल्ली ज़रूर हो जाती है। लगता है कि मैं अकेला नही हूँ। चलिए, हमें तो हिन्दी न आई, मगर बाक़ियों को क्या हो गया? वे क्यों हिन्दी में एक चेक तक नहीं भरते? क्यों इस तरह उनका आह्वान करना पड़ता है? ख़ुद अपनी ज़बान से यह बेदिली कैसी? क्या हुआ उस भाषा को जो हम सब की राष्ट्रीय अस्मिता को परिभाषित करने की महत्वाकांक्षा लेकर मैदाने-जंग में उतरी थी? पिछले सौ-सवा- सौ सालों में कितनों को धराशायी किया इस हिन्दी के रणबाँकुरों ने! क्यों आज वह अपनों से ही इस तरह कट-सी गई है कि उसे इस तरह न्योते बाँटने पड़ रहे हैं? ऐसे ही उलझे हुए सवालों से पिछले सालों में कई बार रूबरू होना पड़ा है, लगातार अपने बरतने लायक़ एक ज़बान की तलाश करते हुए।
बात पुराने ज़माने की है। एक पैसा और पाँच पैसे के सिक्के चला करते थे उन दिनों। चवन्नी में चारमीनार सिगरेट का पैकेट आ जाया करता था। जी, हमारी नौजवानी के दिन। 1970 का वह दौर जो उन दिनों तो एक अलग ही मायने रखा करता था। दुनिया को बदल डालने की ख़्वाहिश, इंक़लाब का जुनून हम सब के सर पर सवार था। चारू मजुमदार का आह्वान था और हममें उनके नक़्शे-कदम पर चल कर एक नई दुनिया बनाने की तमन्ना। बस फिर क्या था? कमर कस कर कूद पड़े थे मैदान में। लेकिन ख़ुदा का लाख शुक्र है कि जल्द ही यह समझ में आ गया कि इंक़लाब चंद जाँबाज़ लोग नहीं, अवाम किया करती है। और अवाम है कि सोई पड़ी है। उसे इस बात का कोई इल्म ही नहीं कि इतिहास ने उसके कँधों पर कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी डाल रखी है। लिहाज़ा अब यह हमारा, इतिहास के कारिंदों का, नए ज़माने के हरकारों का काम हुआ कि सोती हुई जनता को जगाएँ। उसे उसकी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी का अहसास दिलाएं।
तो क़िस्सा यहाँ से शुरू होता है। इस मुई सोई हुई जनता को कैसे जगाया जाए? ज़रूरत है उससे मुख़ातिब होने की। तो फिर परचे निकालिए, मीटिंगें कीजिए, जलसे-जुलूस आयोजित कीजिए। यहीं से शुरू होती है उत्तर-औपनिवेशिक दर्द की एक लम्बी दास्तान। मुख़्तसर में कहूँ तो तमाम उत्तर-औपनिवेशिक समाजों में हम-जैसा एक बड़ा तबक़ा है जो, अगर एलबर्ट मेम्मी या फ़्रान्ज़ फ़ानों के शब्दों में कहा जाए, तो सांस्कृतिक रूप से अपाहिज है। वह अपनी भाषा और उसकी सांस्कृतिक ज़मीन से कट चुका है। वह अंग्रेज़ी या फ़्रांसीसी में बोलने और लिखने-पढ़ने के लिए अभिशप्त है। उत्तर-औपनिवेशिक दुनिया का बुद्धिजीवी हमेशा एक सांस्कृतिक स्किट्ज़ोफ़्रेनिया में जीता है। यह हमारी नियति है। ख़ासकर रैडिकल बुद्धिजीवियों की – जो अपने कमरों में बैठ कर मनन-चिंतन करने की बनिस्बत दुनिया को बदलने की तमन्ना रखते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों को हमेशा अवाम से मुख़ातिब होने में दिक़्कतें पेश आतीं हैं। उन्हें हर वक़्त इस संवाद के लिए ज़बान तलाशनी होती है। अक्सर बनानी होती है। और नेहरूई ज़माने के ‘थ्री लैंग्वेज फ़ॉर्मूला’ से निकले हम लोग तो किसी भी भाषा के लायक़ नहीं रह गए थे। हमें तो एक बरतने लायक़ भाषा तलाशने के लिए कहीं ज़्यादा मशक्क़त करनी पड़ी थी।