आदित्य निगम
नेपाल के चुनावी नतीजों के बारे में हिन्दुस्तान की सरकार भले ही कितना परेशान हो, कम-अज़-कम एक मसले पर माओवादियों के बहुत नज़दीक़ खड़ी दिखाई देती है। जिस तरह पूरा सरकारी तामझाम चीन की मशाल की हिफ़ाज़त में लगा दिया गया, उससे तो ऐसा ही गुमान होता है।
अलबत्ता, नेपाल के माओवादी नेताओं के बारे में हमें शायद इतना जल्दी किसी नतीजे पर नहीं पहुँचना चाहिए। मुमकिन है कि वे आज के चीनी नेताओं के उतने हामी न हों जितना माओ के हुआ करते थे। मगर इस बीच अपने देसी इंकलाबी भाइयों ने अपने नेपाली कामरेडों से कमान छीन ली और, बरस्ते फ़िदेल कास्त्रो के ग्रानमा अखबार, यह ऐलान भी कर डाला कि तिब्बत की आज़ादी की लड़ाई एक अमरीकी साज़िश है।
अभी कुछ ही हफ़्तों पहले हमारे जाँबाज़ों ने – जिसमें माकपा के नेता भी शामिल थे – एक आवाज़ में कोसोवो की आज़ादी को भी अमरीकी साज़िश का नतीजा बता दिया था। और जिन्हें याद होगा, कभी सोवियत संघ के पतन को भी अमरीकी साज़िश बताया गया था।
ख़ैर, साहब आप लोग ही बेहतर जानते होंगे। मुमकिन है कि ज़माने की हवा अमरीका की तरफ़ बह रही हो। यह तो ज़माने से सुनते आए हैं कि अमरीका ख़ुफ़िया तौर तरीक़ों से तख्ता-पलट आदि करवाता रहा है, मगर यह न मालूम था कि व्यापक जन-आंदोलन खड़ा करने में भी वह माहिर है। आप की लुप्त होती प्रासंगिकता की इससे बड़ी दलील और क्या हो सकती है?