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	<title>क़ाफ़िला</title>
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		<title>क़ाफ़िला</title>
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		<title>कल तोड़ी गई, आज बँटी हूँ</title>
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		<pubDate>Mon, 04 Oct 2010 13:01:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>ravikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Culture]]></category>
		<category><![CDATA[Law]]></category>
		<category><![CDATA[Media politics]]></category>
		<category><![CDATA[Violence]]></category>
		<category><![CDATA[बाबरी मस्जिद उच्च न्यायालय मूव ऑन]]></category>

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		<description><![CDATA[कल टूटा था, आज बँटा हूँ। कहना न होगा मैं क्या हूँ।। चले चलो! चरैवेति! आगे बढ़ो, यार! मूव ऑन! कितना आसान है ये सब कहना, कितना मुश्किल है उस पर अमल करना, जो कि अक्सर हर महान सूक्ति के &#8230; <a href="http://kafilahindi.wordpress.com/2010/10/04/%e0%a4%95%e0%a4%b2-%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%88-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%ac%e0%a4%81%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=54&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कल टूटा था, आज बँटा हूँ।<br />
कहना न होगा मैं क्या हूँ।।</p>
<p>चले चलो! चरैवेति! आगे बढ़ो, यार! मूव ऑन! कितना आसान है ये सब कहना, कितना मुश्किल है उस पर अमल करना, जो कि अक्सर हर महान सूक्ति के साथ होता है :  सत्यम् वद, धर्मं चर का हश्र हम जानते हैं! अपने एक ग़मज़दा दोस्त को भी फ़ैसला सुनने के बाद मैंने यही नसीहत दी थी : यार इमोशनल मत होओ! 6 दिसंबर 1992 को शहीद बाबरी मस्जिद, जिसे अलग-अलग लोगों द्वारा रामजन्म भूमि या फिर विवादित ढाँचा कहा गया, अब वापिस विभाजित है। ठीक तो है, जिस विवाद को समाज हल नहीं कर पाता, जिसे राजनीति  सुलझाने में घबड़ाती है, उसे अगर उच्च न्यायालय के तीन मिले-जुले न्यायाधीशों के खंडपीठ ने तीन हिस्सों में बाँट दिया तो सहज ज्ञान तो बोमन ईरानी के रिक्शेवाले के शब्दों में यही कहेगा न : &#8216;किसी को तो अक़ल आई!&#8217; </p>
<p>मैं भी अगर अपने यादों के जीवित गाँव के ज़िन्दा नुमाइंदे के रूप में  पंचायती अवतार में आ जाऊँ तो ख़ुद को उसी रिक्शे वाले के साथ खड़ा पाता हूँ। पर किसी और कोने से की गई &#8216;भूल जाओ&#8217; की हर माँग कलेजे का एक  हिस्सा काट लेती है। कलेजे को काट कर न्याय की कोई स्वीकृति संभव है? शायद पंचायत में ऐसा हो भी जाता पर मैं क्या करूँ, मेरे प्यारे अलगू चौधरी और जुम्मन शेख़ के<br />
बीच में राष्ट्र आ गया। प्रेमचंद के आदर्शवादी यथार्थवाद के बावजूद पंचायत इतना गिरा हुआ शब्द हो गया है कि लोग चलते-फिरते उसे गलियाने लगे। शायद ठीक ही!</p>
<p>लेकिन जिस देश की आज़ादी का भविष्य पंचायती फ़ैसले की बुनियाद पर बना हो, जहाँ आज़ादी<br />
के बाद की ख़ूँरेज़ी कई मौक़ों पर गांधी की पंचायती गुहारों से रुकी या टली हो, जहाँ आज भी<br />
पंचायतें अंतर्जातीय शादियाँ करने पर प्रेमियों का क़त्ल या उन्हें ज़लावतन कर देती हैं, जहाँ मनरेगा की मज़दूरी बाँटने के लिए अभी-भी ग्रामीण निगरानी समितियों को उपयुक्त इकाई माना जाता हो, वहाँ पंचायती शब्द का ऐसा उपहास कुछ हद तक समझ में आता है पर किंचित परेशान भी करता है। </p>
<p>गोकि मेरी निजी ज़िंदगी और मेरे विश्वासों को इससे रत्ती-भर फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वहाँ पर क्या बनता है, क्योंकि मेरा जो था वह तो 6 दिसंबर को ही टूट गया था। </p>
<p>उसके बाद तो लोगों ने अपनी पार्टियों के बहुमत बनाये, सरकारें बनाईं। होशियारी से भूल गए थे पर अब तो लगता है कि मंदिर भी बना लेंगे, कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं। अठारह साल गुज़र चुके हैं, हम कितना आगे बढ़ चुके हैं। अब हम आम आदमी &#8211; ठेले-खोमचेवालों &#8211; को सड़कों से भगाकर उसे राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन पर आभासी तौर पर देखते-दिखाते और गर्वान्वित होते हैं: देखिए हमारी<br />
सांस्कृतिक विविधता &#8211; रंगबिरंगा सुपरपावर परजातंतर! हमारी जनजातियाँ कितना अच्छा नाचती हैं, मगर ये नक्सलवादी उन्हें मौक़ा ही नहीं देते, बंदूक़ थमा देते हैं। नगा-मणिपुरी वेशभूषा कितनी<br />
सजती है वेदमंत्रों और सूर्यनमस्कार के बीच – काश ये दो कौड़ी के बुद्धिजीवी या बाहरी ताक़तें उन्हें जीने की मोहलत तो दें। फ़ैसला आने के बाद भी रहमान कितना अच्छा गाता है: जय हो! लेटअस मूव ऑन!</p>
<p>इस सूरते-हाल में कौन हैं वे लोग जो मूवियाना नहीं चाहते हैं, फँसे रहना चाहते हैं अपने पुराने साँचों-खाँचों में? चंद इतिहासकार जो कभी भी इस देश के नहीं रहे। ये सहमत वाले जिनसे हम हमेशा असहमत रहे हैं! और ये अल्ट्रा-सेक्युलरिस्ट – (ये अपेक्षाकृत नया शब्द है, पचने में वक़्त लेगा) &#8211; हमें तो असम के अलगाववादी दिनों से ही अल्ट्रा-फल्ट्रावादियों से एलर्जी रही है। हू केयर्स! जीडीपी देखो और चले-चलो, कोई साथ न दे तो भी इन्वेस्ट करो और एकला चलो! कारवाँ तो बन ही जाएगा।<br />
देखो तो कितने-सारे लोग चलने पर उतारू हैं!</p>
<p>मज़ेदार बात होती अ‌गर इतनी दुखद न होती कि विभाजन के बाद भी भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रपति ने यही कहा था &#8211; हमें आप लोगों के कृत्य ने दुनिया में बदनाम कर दिया है। लेट अस फ़ॉरगेट ऐण्ड मूव ऑन! कुछ करो मत, अपने-आप इधर इतनी गरम हवाएँ चलेंगी कि जिन्हें झुलसना है वे झुलसने लगेंगे, और सब-कुछ ख़ुद-ब-ख़ुद ठीक हो जाएगा। लौहपुरुष ने कुछ ऐसा ही कहा था लखनऊ में हिन्दुओं से कि मुसलमान त्राहिमाम् करते हुए गांधीजी के पास आए थे। कुछ हुआ नहीं, बस<br />
एक फ़िल्म बनी &#8216;गरम हवा&#8217; नाम से, कई दहाइयों बाद!</p>
<p>मैं भी चल देता अगर कुछ लोगों ने इस फ़ैसले को संख्यात्मक जनवाद से प्रेरित अपने कपोलकल्पित<br />
इतिहास की तस्दीक़ न मान लिया होता। मैं तो चल ही देता अगर संघ-परिवार में से किसी ने जीत<br />
के मौक़े पर भी फ़क़त इतनी दरियादिली दिखायी होती कि कह उठते : हम मस्जिद भी वहीं बनायेंगे! मैं इसलिए भी चल देता &#8211; और हर कोई चलता ही रहता है  कोई कहे न कहे, क्योंकि बक़ौल राही<br />
मासूम रज़ा, बलवे की कहानियाँ ख़त्म हो जाती हैं, लेकिन ज़िन्दगी चलती रहती है &#8211; कि उसको<br />
चलना है।  </p>
<p>लेकिन मुझे इसका भी एहसास है कि हर बलवा मेरे पुराने ज़ख़्म ताज़ा कर देता है! हर बलवा मुझे<br />
अपने घर को दो पग पीछे समेट लेने को बाध्य कर देता है। और मुझे अपने ही घर में लगातार<br />
सिमटते-सिकुड़ते जाना मंज़ूर नहीं। मैं सुप्रीम कोर्ट जाऊँगा, इसलिए नहीं कि मुझे पता है कि मेरे पक्ष में फ़ैसला होगा, बल्कि सिर्फ़ ये देखने के लिए कि मेरे घर की चौहद्दियों को सिकोड़ने की साज़िश कहाँ तक फैली है। और कहाँ तक फैलेगी। क्योंकि तैंतीस करोड़ देवी-देवता और उनके क़ानूनी लल्ला अगर अपना-अपना हिस्सा माँगने चल देंगे तो मेरा निराकार अल्लाह तो बेघर हो ही जाना है!   </p>
<p>पर तब तक या उसके बाद भी मैं तो चलूँगा ही, रुकूँगा नहीं, ख़ातिर जमा रखें! किसके साथ, ये<br />
नहीं बता सकता।   </p>
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		<title>पत्रकारिता के विश्वविद्यालय में संघ की घुसपैठ: शहनवाज़ नज़ीर</title>
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		<pubDate>Sun, 23 May 2010 17:34:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Aditya Nigam</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[Rightwatch]]></category>
		<category><![CDATA[आर एस एस]]></category>
		<category><![CDATA[कुठियाला। माखननलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता वि वि]]></category>

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		<description><![CDATA[शहनवाज़ नज़ीर का गेस्ट पोस्ट। शहनवाज़ दैनिक भास्कर में अखबारनवीस हैं। नाम बृज किशोर कुठियाला, पैदाइश मार्च 1948 शिमला, तालीम समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट, पता फिलहाल भोपाल, पेशे से पत्रकारिता के पंडित हैं और तबियत से संघ के &#8230; <a href="http://kafilahindi.wordpress.com/2010/05/23/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=49&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><em><strong>शहनवाज़ नज़ीर</strong> का गेस्ट पोस्ट। शहनवाज़ </em><strong>दैनिक भास्कर </strong><em>में अखबारनवीस हैं।</em><br />
नाम बृज किशोर कुठियाला, पैदाइश  मार्च 1948 शिमला, तालीम समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट, पता फिलहाल भोपाल, पेशे से पत्रकारिता के पंडित हैं और तबियत से संघ के सिपाही। कुठियाला के कमान संभालने के बाद से माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव संचार विश्वविघालय की आबो हवा में घुटन का माहौल है लेकिन इस घुटन के खिलाफ बगावत का असर भी दिखने लगा है।</p>
<p>23 मार्च, भगत सिंह की शहादत के दिन छात्रों द्नारा विश्वविघालय की दीवारों पर चस्पा किए गए पर्चों को हटा दिया गया है, कैंटीन के खम्भे पर चिपकी पाश की कविता भी फट चुकी है लेकिन प्रवेश द्वार के उपर लगा एक पर्चा किसी तरह बच गया। यह पर्चा परिसर में आने जाने वालों का कुछ इस तरह स्वागत करता है, “मैं विरोध में हूं क्योंकि मुझे अपना होना प्रमाणित करना है, हमें समाज में ऊंच नीच की भावनाओं को बदलना होगा, संघर्ष ही हमें परिष्कृत बनाएगा, इंकलाब ज़िन्दाबाद”। यह पर्चा विश्वविघालय के कुलपति प्रोफेसेर बृज किशोर कुठियाला की कारगुजारियों के विरोध में लगाया गया है जो देश में पत्रकारिता के इकलौते विश्वविघालय को संघ की पाठशाला बनाने की फिराक़ में हैं।<br />
<span id="more-49"></span>आबोहवा बदलने के साथ विश्वविघालय के पाठ्यक्रम भी नए कलेवर के हो गए है। इस कलेवर में भगवा संगठनों का असर दिखता है। भगवा रंग के प्रतीक इस विश्वविद्यालय के नए सत्र की शरुआत एक भव्य यज्ञ से होगी । इस सत्र से शुरु हो रहे 14 नए पाठ्यक्रम में मीडिया प्रबंधन, मीडिया शोध, मनोरंजन संचार, कारपोरेट संचार में एमबीए कराया जाएगा। इसके अलावा भारतीय संचार परम्पराएं और योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एंव अध्यात्मिक संचार में पीजी डिप्लोमा दिया जाएगा। इन कोर्सेज़ को संचालित करने के लिए 50 ऐसे नए संकाय सदस्यों की भरती की जाएगी जो “राष्ट्रवादी” प्रष्ठभूमि के होगें। सूत्र बताते हैं कि भरती का उद्देश्य विश्वविघालय में अपने लिए एक मज़बूत लाबी तैयार करना है ताकि भविष्य में किसी भी कार्य योजना को आसानी से लागू किया जा सके। है। हाल ही में कुठियाला ने सौरभ मालवीय नाम के एक शख्स को अपने सहायक के तौर पर नियुक्त किया है। सौरभ इसी विश्वविघालय से “मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” पर पीएचडी कर रहा है और बीके कुठियाला उसके गाइड हैं। सौरभ और कुठियाला की यारी नई नहीं है। कुठियाला जब कुरुक्षेत्र विश्वविघालय के मीडिया विभाग में पढ़ाते थे तभी से सौरभ के गाइड हैं और कुलपति का पद धारण करने के बाद सौरभ को दिल्ली से भोपाल बुला लिया। दरअसल सौरभ मालवीय पीएचडी में दाखिला लेकर दिल्ली चला गया था और वहां भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर के लिए बतौर मीडिया प्रभारी काम कर रहा था। दिलचस्प है सौरभ मालवीय जिस विश्वविघालय से पीएचडी कर रहा है वहीं से एक कर्मचारी के रुप में 12000 रुपए की तनख्वाह भी उठा रहा है। कुलपति का दुलरुआ होने के नाते सौरभ विश्वविघालय के दीगर संसाधनों का भी उपभोग कर रहा है।</p>
<p>विश्वविघालय का भगवाकरण करने में जुटे कुठियाला उन छात्रों के भविष्य से भी खेल रहे हैं जो बड़ी मुश्किल से उच्च शिक्षा तक पंहुच पाते हैं। विश्वविघालय के मौजूदा छह कोर्सेज़ में हर साल करीब 250 छात्र छात्राएं प्रवेश पाते थे लेकिन नौकरी आधे फीसदी को भी नहीं मिल पाती थी। ऐसे में संचार परंपराएं और अध्यात्म प्रबंधन में डिप्लोमा करने वाले छात्र नौकरी के लिए किसका दरवाज़ा खट खटाएगें, एक बड़ा सवाल है। नौकरी के लिए परेशान कुछ छात्र अपनी फरियाद लेकर कुलपति के पास गए थे लेकिन निराश होकर लौटे। मीडिया में बीके कुठियाला की पंहुच कितनी है यह अलग बात है लेकिन कुलपति अपने चहेते छात्रों का प्लेसमेंट कराते हैं। हाल ही में उन्होने आडियो विज़ुअल विभाग के छात्र आशुतोष चतुर्वेदी को भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय के मीडिया सेल में प्लेस कराया है।</p>
<p>विश्वविघालय की फ़िज़ा बिगाड़ने की क्या तैयारी चल रही है इसका एक नमूना 17 मई को विश्वविघालय परिसर में पूर्व उप राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के निधन पर आयोजित शोक सभा में देखने को मिला। इस दौरान छात्रों को एक प्रश्नावली बांटी गई जिसका शीर्षक गीता में संचार तत्वों का विश्लेषण था। इस प्रश्नावली में कुल 20 प्रश्न पूछे गए थे। प्रश्न संख्या 15 में पूछा गया है कि, क्या आपको लगता है कि गीता में जब अर्जुन धनुष त्यागकर युद्ध करने से मना कर देता है तब वह अवसाद की स्थिति में चला जाता है। प्रश्न संख्या 16, क्या कृष्ण के संचार के कारण ही वह प्रेरणा लेकर युद्ध के लिए पुनः तैयार होता है। प्रश्न संख्या 18, गीता में जो संदेश है क्या वह संचार की दृष्टि से वर्तमान में प्रासंगिक है। प्रश्न संख्या 19, क्या संचार या जनसंचार के पाठ्यक्रमों में गीता को शामिल किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि विश्वविघालय में इस साल से शुरु हो रहे 14 नए कोर्सेज़ के लिए पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। संचार परम्पराएं और योगिक स्वास्थ प्रबंधन एंव अध्यात्मिक संचार जैसे डिप्लोमा कोर्सेज़ के पाठ्यक्रम में गीता को शामिल करने की तैयारी चल रही है। यही नहीं विश्वविघालय में एम. फिल का कोर्स भी शुरु किया गया है जिसमें सदंर्भ पुस्तक के रुप में एकात्म मानववाद को शामिल किया गया है। इस सिद्धांत के जनक पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे जो जनसंघ के संस्थापक सदस्य होने के साथ साथ पहले महासचिव थे और बाद में जनसंघ के अध्यक्ष बने।</p>
<p>माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव संचार विश्वविघालय में ब्रज किशोर कुठियाला की ताजपोशी 19 जनवरी 2010 को हुई और उसी दिन से विश्वविघालय में नई परम्पराएं गढ़ी जाने लगीं। 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के दिन सबसे पहले वंदे मातरम का पाठ हुआ, फिर झंडा रोहण और अंत में राष्ट्रंगान। 30 जनवरी को माखन लाल चतुर्वेदी की पुण्य तिथि पर हुए कार्यक्रम की शुरुआत भी वंदे मातरम से हुई। विश्वविघालय में अब गोष्ठी, सेमिनार या फिर किसी भी कार्यक्रम से पहले वंदे मातरम का पाठ ज़रुरी है। विश्वविघालय में संघ परिवार की सीधे तौर पर आमद भी हो चुकी है। 8 मार्च 2010, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर कुठियाला के निजी कांफ्रेसं रुम में मीडिया की नवीन दिशाएं विषय पर एक गोपनीय कार्यक्रम हुआ। कवरेज के लिए गए विश्वविघालय के इलेक्ट्रानिक्स विभाग के छात्रों को कुठियाला ने मना कर दिया। निजी कांफ्रेसं रुम में छात्रों और संकाय सदस्यों का प्रवेश प्रतिबंधित करके मीडिया की कौन सी नवीन दिशाएं तय की जा रही थीं इसकी तहक़ीकात ज़रुरी है।</p>
<p>बीके कुठियाला की नियुक्ति के बाद परिसर में आरएसएस के कैडरों का जमावड़ा लगना शुरु हो गया है। सबसे पहले आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैघ का आगमन हुआ जिन्होने आरएसएस की उपलब्धियों पर व्याख्यान दिया। इस दौरान जब छात्रों ने सवाल के ज़रिए मनमोहन वैघ को घेरना चाहा तो कुलपति ने हस्तक्षेप करते हुए छात्रों से सिर्फ वैघ जी को सुनने के लिए कहा।  डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय भी यहां के छात्रों को पत्रकारिता के गुर सिखा कर जा चुके हैं। संघ के भारतीय नक्शे के मुताबिक मध्य प्रदेश के एक प्रांत मध्य भारत के प्रांत कार्यवाहक हेमंत मुक्तिबोध भी विश्वविघालय का दौरा कर चुके हैं। हिंदु कैलेंडर के अनुसार नए साल के मौके पर नव वर्ष प्रतिपदा का महत्व विषयक गोष्ठी में हेमंत मुक्तिबोध ने अपने विचार छात्र छात्राओं के साथ साझा किया।</p>
<p>माखन लाल चतुर्वेदी के जन्म दिवस यानी चार अप्रैल को कुठियाला ने एक भव्य कार्यक्रम भोपाल के समन्वय भवन में आयोजित करवाया जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां विषयक गोष्ठी में बोलने के लिए असम और जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल लेफ्टीनेंट जनरल एस के सिन्हा पधारे। याद रहे कि यह वही एस के सिन्हा हैं जिन्होने 90 के दशक में असम में शांति के नाम पर न जाने कितनों को कत्ल करवा दिया। यह वही एस के सिन्हा हैं जिनपर जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने आरोप लगाया था कि मालेगांव धमाकों का आरोपी दयानंद पाण्डेय 2007 में जम्मू कश्मीर के राज भवन में इनका मेहमान था। दिलचस्प है कि पत्रकारिता के पुरोधा के जन्म दिवस पर मुख्य अतिथि एस के सिन्हा माखन लाल का स्मरण करने के बजाए बाहरी और आंतरिक चुनौतियों को पहचानने की वकालत कर रहे थे।</p>
<p>माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविघालय को संघ का अखाड़ा बनाने पर आमादा बीके कुठियाला अति महत्वाकाक्षीं ब्राहम्ण होने के साथ साथ संघ में गहरी पैठ रखते हैं। सूत्र बताते हैं कि कुठियाला की नियुक्ति में संघ ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। प्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दिल्ली बुलाकर संघ ने कुठियाला की नियुक्ति का आदेश दिया था। विश्वविघालय में नए कुलपति के लिए प्रदेश मुख्यमंत्री ने तीन सदस्यीय कुलपति खोज कमेटी बनाई थी जिसमें भाजपा के पूर्व राज्य सभा सांसद चंदन मित्रा, पत्रकार नंद किशोर त्रिखा और राधेश्याम शर्मा शामिल थे। आमतौर पर किसी भी विश्वविघालय में कुलपति के तलाश के लिए बनाई गई सर्च कमेटी के सदस्यों का उस विश्वविघालय से सम्बंध नहीं होता है लेकिन इस कमेटी के तीनों सदस्य विश्वविघालय से सीधे तौर पर जुड़े थे। नंद किशोर त्रिखा जहां विश्वविघालय की अकादमिक परिषद के सदस्य थे वहीं राधेश्याम शर्मा प्रबंध उप समिति के सदस्य थे। चंदन मित्रा दिल्ली में पायनियर मीडिया स्कूल को चलाते हैं जो माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविघालय से ही संबद्ध है। दिलचस्प बात यह है कि ब्राह्मण के नाम पर बने विश्वविघालय में कुलपति की तलाश के लिए बनी कमेटी में बहुमत ब्राह्मण सदस्यों का था जिसने कुलपति के रुप में संघ की प्रष्ठभूमि वाले ब्राह्मण को ही चुना।</p>
<p>यहां यह जानना भी बेहद ज़रुरी है कि प्रोफेसर ब्रज किशोर कुठियाला सिर्फ एम ए पास हैं वो भी पत्रकारिता में नहीं बल्कि समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में। सूत्रों की माने तो प्रोफेसर कुठियाला के एम ए में अंक भी संतोषजनक नही है लेकिन कुठियाला के बायोडेटा में दी गई सूचनाओं के मुताबिक वह देश में मीडिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान में प्रशिक्षण लिया है और उसी संस्थान में 21 साल तक शिक्षक रहे हैं। इसके इतर वह यूजीसी, इग्नू, एनसीइआरटी, 16 विश्वविघालयों और 22 उच्च शिक्षण संस्थानों में सक्रिय रुप से सहयोग भी देते रहे हैं। देश के उच्च कोटि के शिक्षण संस्थानों को सेवा देने वाले प्रोफेसर कुठियाला गुरु श्रेष्ठ एंव सर्वश्रेष्ठ संचारक जैसे पुरुस्कार से सम्मानित हो चुके हैं।</p>
<p>दरअसल बीके कुठियाला के 38 सालों के सफल कैरियर पर हमेशा संघ की कृपा रही है। कुठियाला अपनी युवा अवस्था से ही संघ की सेवा करते रहे और संघ इन्हे पुरुस्कृत करता रहा। सूत्रों के अनुसार, आरएसएस ने गोधरा कांड की जांच करने और रिपोर्ट बनाने के लिए एक कमेटी बनाई थी जिसके सदस्य कुठियाला भी थे। इसके अलावा वह आरएसएस की समाचार एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार के सदस्य हैं। संघ के ही एक पत्रकार और कुठियाला के मित्र श्याम खोसला चंडीगढ़ में पंचनाद नाम से एक संस्थान चलाते हैं जहां गीता में संचार के महत्व का का पाठ पढ़ाया जाता है, कुलपति महोदय इस संस्थान के निदेशक हैं।</p>
<p>संघ के इस सिपाही की पंहुच कहां तक है इसकी ताज़ा मिसाल कुछ दिन पहले देखने को मिली। भारतीय प्रेस परिषद पत्रकारिता के लिए एक आदर्श पाठ्यक्रम बनाने की तैयारी कर रहा है। इस काम के लिए प्रबुद्ध पत्रकारों और पत्रकारिता के शिक्षकों की एक कमेटी बनाई गई है जिसका समन्यवक बीके कुठियाला को बनाया गया है। पत्रकारिता की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था में संघ की घुसपैठ एक बड़े खतरे की ओर इशारा करती है। चिंता की बात यह है कि क्या भारतीय प्रेस परिषद को कुठियाला की प्रष्ठभूमि का पता नहीं है और अगर है तो इतने महत्वपूर्ण पद की ज़िम्मेदारी उसे कैसे सौंप दी गई। रोचक बात यह है कि कमेटी में देश के नामवर पत्रकार और शिक्षक भी जुड़े हैं लेकिन उनमें से भी किसी ने इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। कुठियाला की समन्यवक के पद पर नियुक्ति और कमेटी के सदस्यों की चुप्पी बताती है कि देश में पत्रकारिता जैसे “पवित्र पेशे” के साथ क्या हो रहा है और भविष्य में क्या होगा।</p>
<p>खैर, माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविघालय में 2009-10 का सत्र खत्म होने वाला है। नए सत्र में होने वाले भव्य यज्ञ के लिए विशेष अतिथियों की फेहरिस्त तैयार की जा रही है। छात्रों से कहा जा रहा है कि चाहो तो विश्वविघालय परिसर में शाखा लगा सकते हो, मैं भी आउंगा। प्रोफेसर बीके कुठियाला पत्रकारिता के छात्रों के लिए गणवेश डिज़ाइन कर रहे हैं जिसका रंग खाकी और सफेद होगा।</p>
<p>Shahnawaz Nazeer<br />
Dainik Bhasker<br />
07869106127</p>
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		<title>युद्ध के रूपक का जाल</title>
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		<pubDate>Sun, 23 May 2010 14:54:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>apoorvanand</dc:creator>
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		<category><![CDATA[Violence]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<p>अपने नए बंद के दौरान सी.पी.आई.( माओवादी) ने छत्तीसगढ़ और बंगाल में अर्ध-सैन्य बल के सदस्यों के साथ बस में सफ़र कर रहे साधारण ग्रामीणों की हत्या करने के बाद जो बयान दिया है उससे यह साफ़ है कि अभी शायद इससे भी क्रूरतापूर्ण कार्रवाइयां देखने को मिल सकती हैं. उनके प्रवक्ता ने कहा कि उन्होंने पहले ही छतीसगढ़ के ग्रामीणों को यह बता दिया था कि उन्हें इस युद्ध की विशेष परिस्थिति में क्या करना है और क्या नहीं करना है. मसलन, पुलिस या सैन्य बल के लोगों के साथ किसी भी तरह का कारोबार या सामजिक व्यवहार प्रतिबंधित है, उनके साथ किसी सवारी गाडी में सफ़र नहीं करना है. इसके आगे उनसे यह भी कहा गया है कि उन्हें पुलिस या सैन्य बल की गतिविधियों पर नज़र रखनी है, उनके पास हथियारों का अंदाज़ करना है और इसकी खबर जनता सरकार को देते रहना है. इस दल के प्रवक्ता ने कहा कि साधारण लोगों का मारा जाना अफसोसनाक है लेकिन एक तरह से वे खुद इसके लिए जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने चेतावनी का उल्लंघन किया था.<img title="More..." src="http://kafilabackup.wordpress.com/wp-includes/js/tinymce/plugins/wordpress/img/trans.gif" alt="" /><span id="more-45"></span>प्रवक्ता ने कहा कि वे एक युद्ध लड़ रहे हैं और इसमें ऐसी घटनाओं से बचना मुश्किल है. एक साल पहले माओवादियों के समर्थक कवि वरवर राव ने साधारण लोगों के मारे जाने के बारे में पूछे जाने पर कहा था कि यह महज ब्योरे हैं.</p>
<p>इसका अर्थ यह है कि जिन माओवादियों के बारे में एक हिस्से की यह समझ रही है कि वे दरअसल आदिवासी ही हैं जो अपनी जमीन और संसाधन छीने जाने पर उठ खड़े हुए हैं, उन्हें अपनी राय बदलनी होगी. माओवादियों ने दंतेवाड़ा को अपना क्षेत्र घोषित कर दिया है इसलिए वहां उनका क़ानून चलेगा. आदिवासियों को इस नयी सरकार के मुताबिक़ चलना होगा. तर्क वही हैं जो पुलिस देती रही है या जो वह अभी देगी जब उससे उस एक ग्रामीण की ह्त्या के बारे में पूछा जाएगा जिसे उसने दो रोज़ पहले गिरफ्तार किया और अदालत में पेश करने के पहले ही गोली मार दी. कश्मीर हो या गुजरात या महाराष्ट्र , हर जगह ज्यादतियों पर सफाई देते हुए पुलिस तर्क देती है कि वह ऐसे शत्रु से लड़ रही है जिसका चेहरा उसे नहीं मालूम , इसलिए निशाने पर निर्दोषों के आने पर उसे बहुत घेरा नहीं जाना चाहिए. इससे उसका मनोबल भी गिरता है, इसलिए मानवाधिकार के प्रश्न उसे राष्ट्रविरोधी जान पड़ते हैं.</p>
<p>एक के लिए मानवाधिकार के प्रश्न राष्ट्रविरोधी हैं , दूसरे के लिए वर्ग-युद्ध के समय अप्रासंगिक. दोनों ही स्थितियों में सामान्य जन को अपने जीवन का अधिकार खो देना होता है. मसलन अगर एक गाँव के पास विस्फोट होता है तो शक की बिना पर उसके ग्रामीणों को जेल में डाला जा सकता है, उसी तरह अगर उसके आस-पास माओवादी गिरफ्तार होते हैं या मारे जाते हैं तो ज़रूर गाँव के भीतर से ही खबर गयी होगी , इस शक पर मुखबिरों की पहचान करके उन्हें उचित सज़ा दी जा सकती है.</p>
<p>साधारण परिस्थिति में शायद किसी भी सत्ता को यह अधिकार देने को हम तैयार न हों. लेकिन परिस्थिति अगर असाधारण हो? उदाहरण के लिए अगर राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में हो? ऐसी हालत में क्या हमने संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र करके पोटा जैसा क़ानून लागू होते नहीं देखा जो सारे नागरिक अधिकारों को स्थगित कर देता था? फिर भी पोटा के खिलाफ अभियान चलाया गया और उसे वापस लेना पड़ा. राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न महत्वपूर्ण है फिर भी हम न तो &#8216;पोटा&#8217; और &#8216;आफ्सा&#8217; और न गैरकानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून जैसे कानूनों को वैधता देते हैं. और यह बिलकुल ठीक है.इंग्लैण्ड में जब आतंकवाद के मुकाबले के लिए विश्वविद्यालयों में जासूसी का प्रस्ताव लाया गया ताकि संभावित खतरनाक नौजवानों पर नज़र रखी जाए तो वहां के नागरिकों ने उसका विरोध किया. यही परिपक्व जनतंत्र है.</p>
<p>फिर वर्ग युद्ध या जिसे दीर्घकालिक जन युद्ध कहा जा रहा है, उसके नाम पर अगर लोगों के जीवन के अधिकार का निर्णय कोई दल या समूह अपने हाथ में लेने की दलील पेश करे, भले ही वह अब तक की सबसे वैज्ञानिक विचारधारा के नाम पर ही क्यों न हो,तो क्या उसे स्वीकार कर लिया जाएगा?</p>
<p>कहा जा रहा है कि एक युद्ध चल रहा है. युद्ध में योद्धाओं का मारा जाना स्वाभाविक ही है. उस पर अफ़सोस क्या, पक्ष कोई भी हो? लेकिन सवाल जो नहीं किया जा रहा है कि हम इसे युद्ध क्यों मानें और युद्ध किसने छेड़ा. यह पता करना भी दिलचस्प होगा कि &#8216;जनता के विरुद्ध युद्ध&#8217; जैसी आकर्षक अवधारणा कहाँ से आयी और इस पर बिना विचार किये क्यों स्वीकार कर लिया गया.</p>
<p>पिच्च्ले साल जब गृह मंत्री ने कहा कि माओवादी बहत्तर घंटे को हिंसा रोक दें तो बातचीत हो सकती है. इसकी खिल्ली उड़ाते हुए माओवादियों ने कहा कि जब वे राजनीति में आए नहीं थे तब से युद्ध चल रहा है. हम भले ही ऑपरेशन ग्रीन हंट को युद्ध की शुरुआत मानें, माओवादी इसकी शुरुआत इसे कम से कम चालीस साल पहले मानते हैं अगर और पीछे न जाते हों तो.</p>
<p>फिर हम किस युद्ध के रुकने की बात कर रहे हैं? &#8216;ऑपरेशन ग्रीन हंट&#8217; का रुकना युद्ध का अंतिम रूप से रुकना नहीं है. वह तो क्रान्ति होने और वास्तविक &#8216;नया लोकतांत्रिक राज्य&#8217; स्थापित होने के साथ ही रुक सकता है. और वहां भी अंतिम पड़ाव नहीं होगा क्योंकि वर्ग शत्रु क्रान्ति के साथ ही समाप्त तो नहीं हो जाते, इसलिए यह युद्ध गुणात्मक रूप से नए स्तर पर पहुँच जाएगा. हर क्रान्ति का इतिहास यही है. और चूंकि जनता का राज्य चारों ओर से वर्ग-शत्रु राज्यों से घिरा होगा , जनता के दल को और उसके सेना को हमेशा असाधारण अधिकार चाहिए होंगे.</p>
<p>इस पूरे हिंसा चक्र पर स्थिर चित्त होकर हम विचार करें तो मालूम होगा कि युद्ध की इस शब्दावली को अस्वीकार किये बिना आगे बढना असंभव है. यह पूछ जाना चाहिए कि युद्ध किस भौगोलिक क्षेत्र में चल रहा है. इसकी सीमा कौन तय कर रहा है? क्या उड़ीसा , झारखंड , बंगाल, छत्तीसगढ युद्ध भूमि है और यहाँ युद्ध के रुकने की बात की जा रही है. फिर बिहार में जमुई में क्यों हत्याएं की गईं ? युद्ध की भौगोलिक सीमा क्या माओवादियों की सुविधा से तय के जा रही है?</p>
<p>इस पूरे घटना क्रम में कुछ बातों पर हम कभी विचार नहीं कर पाते क्योंकि दुहाई असाधारण परिस्थिति की दी जाती है. मसलन, बंगाल में जिन चार ग्रामीणों की ह्त्या कर दी गयी, उनके लिए जिम्मेदार अपराधियों को सजा देने या मारे गए लोगों के लिए न्याय के बारे में हमें क्या कहना है? या झारखंड में कॉँग्रेस के नेता हेमंत बेगे की ह्त्या के लिए उत्तरदायी की पहचान का प्रश्न या उड़ीसा में , छत्तीसगढ में मारे गए ग्रामीणों के लिए इन्साफ का सवाल?</p>
<p>ये विचारणीय नहीं क्योंकि ये हत्याएं तो युद्ध के दौरान हुई हैं! यह वैसा ही तर्क है जो छत्तीसगढ़ की पुलिस दे रही है जिसने पिछले साल बारह ग्रामीणों को मार डाला और इसे उचित ठहराने के लिए उन्हें माओवादी ठहरा दिया.</p>
<p>युद्ध का रूपक इस प्रकार माओवादियों के लिए सुविधाजनक है और छत्तीसगढ़ या बंगाल जैसी अक्षम पुलिस के लिए भी. माओवादी इसकी आड़ में अपने प्रभाव-विस्तार के लिए आतंक का सहारा लेने को युद्ध के नियम से जायज़ ठहरा सकते हैं जोकि वे कर रहे हैं.मसलन यह फरमान जारी करना कि आप किस दल में न रहें. उसी प्रकार जितने समय तक युद्ध का यह रूपक सामान्य भाषा व्यवहार पर हावी रहेगा पुलिस को अपने अक्षमता पर पर्दा डालने का बहाना रहेगा, कि वह बेचारी एक युद्ध लड़ रही है, एकाध योंही मौत हो तो हंगामा क्यों!</p>
<p>वस्तुतः युद्ध जितना हथियार से नहीं लड़ा जाता उतना भाषा में लड़ा जाता है. युद्ध को रूपक की श्रेणी से निकाल कर अभिधा बना देना पहली सफलता थी और इसमें माओवादी आगे रहे. यह अलग प्रश्न है मानवाधिकार के प्रश्न पर काम करने वाले या भाषा का ही कारोबार करने वाले लेखक इस भाषाई व्यूह में कैसे फँस गए . शायद इसका कारण यही हो कि सशस्त्र संघर्ष या युद्ध की अवधारणा इतिहास में हमेशा आकर्षण पैदा करती है. लोकतंत्र एक समय के बाद रोज़मर्रा के बाकी कामों के तरह का उबाऊ व्यापार बन जाता है और उसमें कोई उत्तेजना नहीं रह जाती. युद्ध खून में तेजी पैदा करता है.लेखक और कलाकारों को यह खासकर सम्मोहित करता है, हालांकि बाद में इस युद्ध से बनी सत्ता के शिकार वही होते हैं जिन्होंने इसके गीत गाये थे. इसलिए भी कि वे पर्याप्त रूप से सख्त नहीं होते और युद्ध आपसे अनंत काल तक और असीमित सख्ती की मांग करता है.</p>
<p>बहुत आश्चर्य नहीं कि नौजवान भगत सिंह ने फांसी का इंतज़ार करते हुए और उसके पहले भी यह बहुत साफ़ साफ़ कहा था कि सशस्त्र संघर्ष जन आन्दोलन से पीछे की अवस्था है. इसे उन्होंने पटाखेबाजी तक कहा था और यह भी कि ऐसे दुनिया में कोइ बड़ी तब्दीली नहीं लाई जा सकती. यह तो एक नौजवान ने, जो पच्चीस साल का भी नहीं हुआ था , समझ लिया था. तब से अब तक समय बहुत गुजर गया. सशस्त्र संघर्ष के जरिये जनता के नाम पर कायम राज्यों के बारे में काफी कुछ मालूम हो चुका . फिर भी अगर हम इस मिथ में विश्वास करते हैं तो इसका एक कारण शायद यही है कि मनुष्य साधारण गद्य की भाषा से अधिक चमत्कृत काव्यात्मक रूपकों से होता है!</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kafilahindi.wordpress.com/45/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kafilahindi.wordpress.com/45/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kafilahindi.wordpress.com/45/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kafilahindi.wordpress.com/45/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kafilahindi.wordpress.com/45/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kafilahindi.wordpress.com/45/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kafilahindi.wordpress.com/45/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kafilahindi.wordpress.com/45/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kafilahindi.wordpress.com/45/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kafilahindi.wordpress.com/45/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kafilahindi.wordpress.com/45/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kafilahindi.wordpress.com/45/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kafilahindi.wordpress.com/45/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kafilahindi.wordpress.com/45/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=45&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>सुपरहीरो की उदासी का सबब &#8211; अभय कुमार दुबे</title>
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		<pubDate>Sun, 23 May 2010 14:48:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Aditya Nigam</dc:creator>
				<category><![CDATA[Culture]]></category>
		<category><![CDATA[Debates]]></category>
		<category><![CDATA[Images]]></category>
		<category><![CDATA[अभय कुमार दुबे]]></category>
		<category><![CDATA[बैटमैन]]></category>
		<category><![CDATA[सुपरहीरो]]></category>
		<category><![CDATA[फ़ैंटम]]></category>

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		<description><![CDATA[[अभय कुमार दुबे का यह लेख नवभारत टाइम्‍स मे छपा था। यहाँ इसे दीवान लिस्‍ट के सौजन्‍य से पेश किया जा रहा है। सितम्बर 2008 मे! यह लेख क़ाफ़िला में छपा था। उनका यह आलेख अमरीकी पॉपुलर कलचर के कई किरदारो &#8230; <a href="http://kafilahindi.wordpress.com/2010/05/23/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%ac-%e0%a4%85/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=43&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>[<strong>अभय कुमार दुबे</strong> का यह लेख <a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3404266.cms" target="_blank">नवभारत टाइम्‍स</a> मे छपा था। यहाँ इसे<strong> दीवान लिस्‍ट</strong> के सौजन्‍य से पेश किया जा रहा है। सितम्बर 2008 मे! यह लेख <a href="http://kafila.org/2008/09/02/%E0%A4%86%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A5%8B-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%97%E0%A4%AF/" target="_blank">क़ाफ़िला में छपा था</a>। उनका यह आलेख अमरीकी पॉपुलर कलचर के कई किरदारो की यकायक गायब होती 'प्रासंगिकता' पर नज़र डालता है। इस दिलचस्‍प लेख का एक पहलू वह है जो शीतयुद्धोत्तर अमरीका की बदली हुई राजनीतिक हैसियत के साथ पॉपुलर मानसिकता का एक गहरा रिश्‍ता देखता है। पढ़ते हुए अनायास स्‍लावोज ज़िज़ेक का एक लेख याद आ गया जिसमें वे उस अमरीकी फ़ंतासी (या दुस्‍वप्‍न?) की बात करते हैं जिसमें एक आम अमरीकी हमेशा किन्‍हीं एलियन्‍स या डायनोसॉरों द्वारा आक्रांत होने के रोमांचक ख़ौफ़ में जीता है, और जो 11 सितम्‍बर 2001 को अचानक चरितार्थ होती है। शायद किस्‍सा बैटमैन आदि पर ख़त्‍म नहीं होता।]</p>
<p>फैंटम, जादूगर मैंड्रेक  और फ्लैश गॉर्डन के कारनामों की खुराक पर बचपन गुजारने वाले भारतवासियों की पीढ़ी को मालूम होना चाहिए कि कॉमिक्स के पन्नों से हमारी-आपकी जिंदगी में झांकने वाले सुपर  हीरो किरदारों की दुनिया अचानक बदल गई है। अमानवीय ताकतों से लैस जो चरित्र दुनिया को भीषण किस्म के खलनायकों से बचाने का दम भरते थे, आज अपनी ही उपयोगिता के प्रति संदिग्ध हो गए हैं।</p>
<p>जो लोग फैंटेसी की दुनिया से बाहर नहीं निकलना चाहते उन्हें यह देख कर अफसोस हो सकता है कि  उनका &#8216;फ्रेंडली नेबर&#8217; स्पाइडरमैन पिछले दिनों रिटायर होते-होते रह गया। अब गौथम सिटी का रक्षक बैटमैन भी बुराई से लड़ने का अपना फर्ज निभाने में खुद को नाकाफी महसूस करने लगा है। इस बात का एहसास पिछले दिनों हमारे देश में सुपरहिट हुई हॉलिवुड की कुछ फिल्मों को देख कर हुआ है।<img title="More..." src="http://kafilabackup.wordpress.com/wp-includes/js/tinymce/plugins/wordpress/img/trans.gif" alt="" /><span id="more-43"></span>सुपर हीरो किरदारों की कहानी में आया यह एक ऐसा ट्विस्ट है जिसकी कल्पना उन्हें रचने वाले कलाकारों ने कभी नहीं की होगी। पहले स्पाइडरमैन उदास हुआ,और अब<br />
बैटमैन खिन्न हो गया है। हमें यकीन है कि यही हालत सुपरमैन,फेंटेस्टिक फोर,गार्थ,हैलबॉय,आइरन मैन और कैप्टन अमेरिका की  होने वाली है।</p>
<p>यह चक्कर क्या है? क्या दुनिया पहले से बेहतर हो गई है? या फिर दुनिया शेक्सपियर की भाषा  में &#8216;खतरे से भी ज्यादा खतरनाक&#8217; किस्म के किसी खतरे का सामना कर रही है जिससे ये पुरानी चाल के सुपर हीरो नहीं लड़ सकते? ऐसा लगता है कि सुपर हीरो चरित्रों की इस दुर्गति का जायजा असली दुनिया की कसौटियों के मुताबिक लेने का मौका अब आ गया है।</p>
<p>हम अच्छी तरह से जानते हैं कि इनमें से हर सुपर हीरो असली ज़िदगी की उन समस्याओं के काल्पनिक  हल लेकर सामने आता रहा है, जिन्हें हमारी दुनिया राजनीति और समाज के दायरे में हल करने में  नाकाम रही है। मसलन, रात के अंधेरों में होने वाले अपराधों<br />
का उन्मूलन चूंकि पुलिस  प्रशासन के बस की बात नहीं होती, इसलिए समाज को बैटमैन जैसे चरित्र की जरूरत पड़ती है।</p>
<p>इसी तरह जब हमारे जंगलों और आदिवासी समाज के सिर पर सभ्य समाज के जंगली मंडराने लगते हैं, तो  वन्य संरक्षण की नीतियों की नाकामी के गर्भ से फैंटम नामक<br />
नकाबपोश की लोकप्रियता का जन्म होता है। इन रोजमर्रा की बचाव कार्रवाइयों के साथ-साथ ये तमाम सुपर हीरो कुछ अजीबो-गरीब  लगने वाले खलनायकों से भी लड़ते<br />
हैं जो दरअसल इनका असली और ज्यादा जरूरी काम है।</p>
<p>हकीकत तो यह है कि इन सभी का जन्म उस पॉप कल्पनाशीलता की उपज है जिसकी बुनियाद  प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पड़ी और जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के शीतयुद्ध में परवान चढ़ी। इन तमाम  चरित्रों का आदि पुरुष कैप्टन अमेरिका था, जो अपनी अभूतपूर्व शक्ति और एथलेटिक क्षमताओं के साथ-साथ एक जबर्दस्त शील्ड (ढाल) लिए रहता था।</p>
<p>तीसरे दशक में गढ़े गए इस सुपर हीरो का नाम यूं ही अमेरिका पर नहीं रखा गया था। यह सीधे-सीधे  अमेरिका की विश्व-रक्षक होने की महत्त्वाकांक्षा का कॉमिक्स के संसार में प्रतिनिधित्व करने वाला  चरित्र था। कैप्टन अमेरिका की लोकप्रियता का नतीजा यह निकला कि पचास के दशक में कई प्रतिभाशाली पॉप कलाकारों ने कल्पना के घोड़े दौड़ा कर नए-नए हीरो गढ़ने शुरू कर दिए। इस इतिहास के कारण ही अधिकतर सुपर हीरो अमेरिकी कल्पनाशक्ति की उपज हैं।</p>
<p>उनके कभी भी हो सकने वाले पराभव को भी हमें इसी कल्पनाशक्ति में आए परिवर्तन की रोशनी में  देखना होगा। अमेरिकी कल्पनाशीलता में एक बहुत बड़ा परिवर्तन अस्सी के दशक के दौरान आया। सोशलिस्ट ब्लॉक तेजी के साथ खात्मे की तरफ बढ़ रहा था, और अगले कुछ सालों में शीतयुद्ध खत्म होते ही बाहरी खतरे के सारे स्त्रोत मिट जाने वाले थे।<br />
अमेरिका के सामने सवाल यह था कि अब वह सांस्कृतिक रूप से खुद को परिभाषित कैसे करेगा।</p>
<p>उसे एक नया दुश्मन चाहिए था। चूंकि ये सारे चरित्र पत्रकारिता, साहित्य, फिल्मों और<br />
ललित कलाओं से अलग एक खास किस्म के पॉप कल्चर की उपज थे, इसलिए उनकी<br />
गढ़ंत में परिवर्तन की लहर का वाहक कोई पॉप कलाकार ही हो सकता था। यह जिम्मेदारी निभाई ग्रैफिक उपन्यास की विधा ने, जिसे फ्रेंक मिलर और उनके कई समकालीनों ने विकसित किया। इन लोगों ने सुपर हीरो का संघर्ष बाहर की बजाय भीतर<br />
की ओर मोड़ दिया। मिलर ने बैटमैन को &#8216;डार्क नाइट&#8217; में बदल दिया। एक ऐसे योद्धा में जो न केवल अपराधियों से लड़ रहा है, बल्कि अपने मन के राक्षसों से भी संघर्ष कर रहा है। ग्रैफिक उपन्यास ने कॉमिक्स के खलनायकों को भी बदला और उन्हें सुपर हीरो के ही चरित्र का दूसरा पहलू बना कर पेश किया।</p>
<p>इन नई विधा द्वारा की गई यह इंजीनियरिंग उस समय एक भयानक विस्फोट के साथ अमेरिका की धरती पर साक्षात प्रगट हुई जब न्यूयॉर्क में नाइन-इलेवन का हाहाकार मचा।  तब बुराई, दुष्टता और इंसानियत के दुश्मनों का एक नया चेहरा सामने आया जो कॉमिक्स के पृष्ठों पर  वर्णित किसी वैज्ञानिक प्रयोग की विफलता का नतीजा नहीं था।<br />
खलनायकी के इस रूप को पुराने संस्करण के बदमाशों और लुटेरों की तरह पैसे की चाह भी नहीं थी। वह तो दुनिया को धू-धू करके जलता हुआ देखना चाहता था।</p>
<p>इसी आयाम को साकार करने के लिए नए बैटमैन का खलनायक बुराई को तो नए सिरे से संगठित करता ही है, वह अपने काले कारनामों को कुछ इस प्रकार नियोजित करता है कि<br />
अच्छाई के सभी प्रतीकों के भीतर छिपी बुराई निकल कर सामने आ जाती है। खलनायक जोकर द्वारा किए गए इस कमाल में  आतंकवाद का विचारधारात्मक चेहरा देखा जा सकता है। उस पर सुपर हीरो की अतिमानवीय ताकत से  भी काबू नहीं पाया जा सकता।</p>
<p>जाहिर है कि अमेरिका को नई चाल के सुपर हीरो की जरूरत है। भले ही उसमें चमगादड़ या मकड़ी से लाई गई ताकत न हो, पर उसमें नए तरह के खलनायक और बुराई के नए संस्करण से लड़ने की क्षमता अवश्य होनी चाहिए। शीतयुद्ध बहुत पीछे छूट चुका है। यह अल कायदा का जमाना है। सुपरमैन की आंख लोहे की दीवार के पार तो देख लेती है, पर आत्मघाती बॉम्बर के मन में नहीं झांक सकती। इसीलिए पुरानी चाल के तमाम सुपर हीरो आज अपनी व्यर्थता का सामना कर रहे हैं।</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kafilahindi.wordpress.com/43/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kafilahindi.wordpress.com/43/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kafilahindi.wordpress.com/43/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kafilahindi.wordpress.com/43/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kafilahindi.wordpress.com/43/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kafilahindi.wordpress.com/43/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kafilahindi.wordpress.com/43/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kafilahindi.wordpress.com/43/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kafilahindi.wordpress.com/43/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kafilahindi.wordpress.com/43/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kafilahindi.wordpress.com/43/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kafilahindi.wordpress.com/43/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kafilahindi.wordpress.com/43/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kafilahindi.wordpress.com/43/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=43&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>एक पुराने कॉमरेड की अंतिम यात्रा: सांत्वना निगम</title>
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		<pubDate>Sun, 23 May 2010 14:27:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Aditya Nigam</dc:creator>
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		<category><![CDATA[Leftwatch]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास]]></category>
		<category><![CDATA[कम्युनिस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[क्रांति]]></category>
		<category><![CDATA[सांत्वना निगम]]></category>

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		<description><![CDATA[निम्नलिखित कहानी सांत्वना निगम द्वारा भेजी गई एक आमंत्रित रचना है। नोट: फ़ायरफ़ॉक्स या ऑपेरा इस्तेमाल करने वाले पाठक कृपया पढ़ते वक़्‍त फ़ॉन्ट बढ़ाने के लिए ( Ctrl +) दबाएं। संस्मरण एक पुराने कॉमरेड की अंतिम यात्रा &#8220;साला भैंचो गॉरबाचोव, &#8230; <a href="http://kafilahindi.wordpress.com/2010/05/23/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%89%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a1-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ae/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=39&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>निम्नलिखित कहानी <strong><em>सांत्वना निगम</em></strong> द्वारा भेजी गई एक आमंत्रित रचना है।</p>
<p><em>नोट: फ़ायरफ़ॉक्स या ऑपेरा इस्तेमाल करने वाले पाठक कृपया पढ़ते वक़्‍त फ़ॉन्ट बढ़ाने के लिए ( Ctrl +) दबाएं।</em></p>
<p><strong>संस्मरण</strong></p>
<p><strong>एक पुराने कॉमरेड की अंतिम यात्रा</strong></p>
<p>&#8220;साला भैंचो गॉरबाचोव, कैपिटलिस्टों का एजेंट &#8230; सब तोड़-फोड़ कर चकनाचूर कर दिया। युगों की मेहनत के ऊपर खड़े महल को ताश के घर की तरह ढहा दिया। हरामी ने ग्लासनोस्त हूँ: चूतिया कहीं का&#8221; संझले भैया चोट खाए सांप की तरह फुंफकार रहे थे। हालाँकि मेरा मन भी उदासी की गहरी परतों के नीचे दब चुका था, फिर भी मैंने जैसे उन्हें दिलासा देने के लिए कहा &#8220;भैया याद है? स्टडी सर्कल में जब हम तुमसे प्रश्न पूछते थे तुम अकसर कहते थे &#8211; &#8216;इतिहास अपने रास्ते पर चलता है लेकिन बेतरतीबी से नहीं &#8211; कार्यकारण से जुड़ी होती है सारी घटनाए। सड़ी गली समाज व्यवस्था से ही उपजती है क्रांति वग़ैरह-वग़ैरह।&#8217; शायद उस समाज में भी सड़न आ गई थी, नहीं तो भुरभुराकर ढह कैसे गया?&#8221; &#8220;अरे रखो तुम्हारी अधकचरी थ्योरीज़, ख़ाक समझाती हो, ख़ाक़ जानती हो।&#8221; भैया चिड़चिड़ा कर बोले। &#8220;मुझे तो लगता है साम्यवाद फिर से वापस आएगा, शायद किसी और शक़्ल में&#8221; मैंने कमज़ोर-सी आवाज़ में कहा। &#8220;खाक़ आएगा।&#8221; यह कैपिटलिस्ट सिस्टम, यह कंज़्यूमरिज़्म का दानव सब कुछ निगल जाएगा। संझले भैया दहाड़े। हरियाणा के एक छोटे-से क़स्बे के मकान के आँगन में यह वार्तालाप चल रहा था। मैं अपने &#8220;पुराने कॉमरेड&#8221; भाई से मिलने गई थी। महीने में एक बार जाती थी &#8211; पिछले तीस सालों से ।<img title="More..." src="http://kafilabackup.wordpress.com/wp-includes/js/tinymce/plugins/wordpress/img/trans.gif" alt="" /><span id="more-39"></span>हमारे परिवार में राजनीति का यह आलम कि जैसे तो अलग अस्तित्व साबित करने के लिए अलग राजनीतिक पहचान भी होनी चाहिए। बाबा (पिता) घोर गाँधीवादी। ताजिंदगी कांग्रेस का काम किया, जेल गए। आज़ादी के बाद जब पद और ज़िम्मेदारी दोनों में से एक को चुनने की बात होती तो बाबा हमेशा पद को ठुकरा देते और ज़िम्मेदारी ले लेते। हर जगह नाम के आगे लगा रहता &#8220;आनेररी&#8221;। ऑनररी प्रेसिडेन्ट ऑफ़ कॉपरेटिव सोसाईटी, ऑनरेरी फलांना, आनेररी ढिमाका। बाबा के राजनैतिक जीवन से एकदम उदासीन माँ घोर हिन्दूवादी &#8211; जातपात, छुआछात, व्रत, उपवास की हिमायती पर मूर्ति पूजा? कतई नहीं &#8211; रामकृष्ण परमहंस की भक्त। बड़े भैया रैडिकल ह्यूमैनिस्ट और हम बहने बाबा की पिछलग्गू। महिला कांग्रेस की सदस्याएँ। सन् 42 में बाबा तीसरी बार जेल गए। संझले भैया ने तभी इंटर पास किया था। बस आगे पढ़ने का इरादा छोड़ नेवी ज्वाइन कर ली। रेटिंग थे &#8211; बंबई के किसी जहाज़ में। हर महीने माँ के पास मनीऑर्डर आता था। दो ढाई साल यह सिलसिला चलता रहा। फिर मनीऑर्डर नदारद और कोई ख़बर भी नहीं। बहुत खोजख़बर के बाद यही पता चला कि बंबई मैं ही हैं और ठीक हैं। सन् 46 में बाबा लौट आए और बिखरा परिवार समेटने में लग गए। तभी एक दिन हमारे घर की कुंडी खड़की और खोला तो संझले भैया बाहर खड़े थे।</p>
<p>सफ़ेद आधी बांह की कमीज़, सफ़ेद हाफ़ पैंट, काला, दुबला लंबा शरीर। सफ़ेद दाँतों की बत्तीसी दिखाते बोले ‘‘जेल से आ रहा हूँ।’’ जेल ? जेल क्यों? तुम भी बाबा की तरह &#8230; ? नहीं नहीं अंदर तो चलो बताता हूँ।</p>
<p>सुबह की धूप में आँगन में हम बहनें और माँ बैठे हैं और संझले भैया बता रहे हैं &#8211; हमसे डैक पर झाडू लगवाते थे। पाखाना साफ़ करवाते थे, बात-बात पर गाली देते थे। सफ़ेद चमड़ी वाले अफ़सर। तो हम सबने स्ट्राइक कर दी और जो लोग हड़ताल में शरीक हुए उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। तीन महीने जेल काटी। जेल में ही मन पक्का कर लिया था कि अब अंग्रेजों की गुलामी नहीं करनी है और बस घर आ गया। आज़ादी के कुछ ही पहले ‘‘नेवल म्यूटनी’’ में शरीक हुए थे संझले भैया, एक अदना से रेटिंग के रूप में।</p>
<p>बाबा के जेल से लौटने के बाद हम तीनों बहनें फिर से स्कूल जाने लगीं। बाबा ने छोड़ी हुई वकालत फिर से शुरू की लेकिन संझले भैया के लिए बाबा का मन अपराध बोध की भावना से भरा रहता। ‘‘क्या करने को मन चाहता है ?’’ बाबा ने पूछा। ‘‘पता नहीं’’। ‘‘खेती करोगे’’ ? ‘‘देखता हूँ’’। पच्चीस बीघा ज़मीन ख़रीदी गई पास के गाँव में। एक छोटा-सा एक कमरे का मकान भी बनाया गया। भैया सुबह साइकिल उठाते और गाँव चले जाते। फिर कुछ दिन बाद वहीं रहने लगे। शनिवार इतवार को घर आते। दोस्तों से कहते ‘‘मन नहीं लग रहा। तभी माँ बहुत बीमार पड़ी और इलाज के लिए पानी के भाव ज़मीन बेच दी गई। कुछ पैसा इलाज में लगा और बाकी के बचाकर बाबा ने भैया से पूछा ‘‘पॉलट्री फॉर्म चलाओगे ?’’ भैया ने कहा ‘‘देखता हूँ।’’ फिर कुछ दिन मुर्गी पालन का शगल चला जो फेल हो गया। भैया फिर घर में। अब की बार बाबा ने पूछा ‘‘आगे पढ़ोगे ?’’ भैया ने कहा ‘‘हाँ, पर साइंस नहीं।’’ भैया पढ़ने लगे। प्राइवेट बी.ए. किया, फिर बी.टी., फिर मास्ट्री करते हुए अंग्रेज़ी में एम. ए. कर लिया।</p>
<p>हमारे घर के सामने बड़ा-सा बरामदा था। उसके दोनों सिरे पर दो छोटी-छोटी कोंठरियाँ थीं। आठ बाई आठ की। एक में स्टोर था, दूसरी कोठरी संझले भैया को दी गई थी। चारपाई की जगह थी नहीं। सो ज़मीन पर ही बिस्तर लगा रहता था। ठंड के दिनों में  मोटा गद्दा बिछा दिया जाता था। भैया अपनी कोठरी का दरवाज़ा हमेशा बंद रखते थे। हमारे लिए वहाँ जाना वर्जित था।</p>
<p>उन्हीं दिनों संझले भैया की गतिविधि कुछ अज़ीब-सी हो गई थी। रात के बारह बजे आते। रसोई में ढका हुआ ठंडा खाना खाते। देर से सोते और देर में उठते और अक्सर ही साइकिलों पर उनके दो तीन दोस्त आते। कोठरी में घुस जाते, धुंआधार बहसें होतीं। मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, बुर्जुआ, पैटीबुर्जुआ, कैपिटलिज़्म जैसे शब्द बंद किवाड़ों की दरार से छन कर आते। बाबा की भौंह सिकुड़ी रहती &#8211; यह जान कर कि बेटा साम्यवाद की दीक्षा ले रहा है &#8211; पर कहते कुछ नहीं।</p>
<p>एक दिन भैया और उनके दोनों कॉमरेड दोस्त शाम को जाने कहाँ से आए और भैया आते ही गुसलखाने में चले गए, उबकाई रोकते हुए। जब मुँह धोकर अपनी कोठरी में घुसे। उन्हें बड़ी झिड़कियाँ पड़ रही थीं। ‘‘कुछ नहीं यार, तुम्हारे इन पैटी बुर्जुआ संस्कारों को मरने में बहुत समय लगेगा। तुम सर्वहाराओं के साथ घुलमिल कर काम करने लायक नहीं हों। ‘‘बाद में भैया ने बताया कि दोनों कॉमरेड जमादारों और क्लास फोर कर्मचारी यूनियन के नेता थे। भैया को एक जमादार के घर खाना खिलाने ले गए थे। तब फ्लश का जमाना नहीं था। जमादार की टूटी-फूटी झोंपड़ी में तीनों चटाई पर बैठ गए थे। मुड़ी-तुड़ी अल्यूमिनियम की थाली में दाल रोटी पर परोसी गई थी। जो उन दोनों पुराने कॉमरेडों ने मज़े से खाई, लेकिन संझले भैया खा न पाए, उबकाई दबाते बैठे रहे। और घर आकर यह था उनका दीक्षारंभ। तो संझले भैया की मिडल क्लास मानसिकता का ख़्याल कर पार्टी न उन्हें टीचर्स यूनियन सभालने का काम सौंप दिया। जिसे संझले भैया अध्यापन के पहले दिन से रिटायरमेंट की आख़िरी तारीख़ तक निभाते रहे।<br />
संझले भैया अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। हरियाणा का एक छोटा-सा क़स्बा सोनीपत &#8211; वहाँ छोटूराम आर्या कॉलेज़ में। कहते थे &#8211; ‘‘चैलेंज़ है यहाँ पढ़ाना।’’ शोक्सपीयर, मिल्टन, वर्डस्वर्थ शेली को हिन्दी में पढ़ाना पड़ता है। अंग्रेज़ी में बोलो तो स्टूडेंट्स पूछते हैं, ‘‘कै कै रैओ मास्साब, समझ नहीं आता, हिन्दी में समझाओ।’’ ‘‘इफ़ विंटर कम्स कैन स्प्रिंग बी फॉर बिहाइंड’’ यहाँ तक हिन्दी में समझाया जा सकता है पर &#8220;ट्रंपैट ऑफ़ प्रॉफेसी ओ विंड&#8221; (भविष्यवाणी के भोंपू ) को समझाना? पर गाड़ी चल ही रही है। पास हो जाते हैं तो घी का टीन, गुड़ की भेली लेकर आ धमकते हैं। साफ़दिल,  नेक जाट विद्यार्थी। भैया पूरी लगन से पढ़ाते और टीचर्स यूनियन और जाने कितने और यूनियनों का काम जोरोशोरों से चलता।</p>
<p>धर्म, अंधविश्वास, रीति-रिवाज़ों को भैया ने जैसे अपने जीवन और परिवार से देश निकाला दे दिया था। पर कभी-कभी समझौते तो करने ही पड़ते हैं &#8211; भैया को भी एकबार करना पड़ा था बड़े हास्यकर ढंग से।</p>
<p>बीस वर्ष पहले बाबा गुज़र गए थे। बाबा विश्वासी थे पर कर्मकांडी नहीं। पर माँ क्रिया-कर्म श्राद्ध शांति पर विश्वास करती थीं। वे ज़िद करने लगी कि तेरहवीं पर ब्राह्मण भोजन कराया जाए। संझले भैया भड़क उठे ‘‘ब्राह्मण भोजन।’’ मैं किसी साले ब्राह्मण को नहीं खिलाऊँगा। सालों ने देश और समाज का मटिया मेट करके रख दिया है हूँ: ब्राह्मण भोजन। माँ दुखी थीं &#8211; तेरे बाबा की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी, भटकते रहेंगे। ‘‘गांधी जी के भजन गवा देंगे’’ भैया बोले। माँ ने फिर रट लगाई – सिर्फ़ पाँच ब्राह्मणों के खिलाने से ही चलेगा। बहस और गरमा गरमी बढ़ती गई तो मैंने सुझाया ‘‘भैया आपके दो सबसे करीबी दोस्त वशिष्ठ और शर्मा जी तो ब्राह्मण ही है न। ऐसा करो वशिष्ठ जी और उनका बेटा, शर्मा जी और उनका बेटा और हमारा भाँजा (छोटी बहन ब्राह्मणों के घर ब्याही थी) हो गए पाँच। और इन पाँचों को बुलाकर खिलाया गया। वे खाते समय हँसते रहे कि वाह कॉमरेड, तो ब्राह्मण भोजन हो ही गया। कोई बात नहीं, माताजी के दिल को शांति मिली और वैसे भी हम कम्युनिस्टों के लिए तो ‘‘एंड्स जस्टिफाइ द मीन्स’’। ‘‘हरि ओम’’ कहकर एक बड़ी-सी डकार ली। और डकार की भरपूर आवाज़ को डुबाते हुए भैया दहाड़े &#8211; अबे ब्राह्मण की औलादों को नहीं अपने कॉमरेड दोस्तों को खिला रहा हूँ और माँ का मन रख रहा हूँ।</p>
<p>उन दिनों मैं महाश्वेता देवी का उपन्यास ‘‘अग्निगर्भ’’ पढ़ रही थी। पूरी ज़िंदगी पार्टी के लिए काम करने के बाद किसी एक तथा कथित पार्टी विरोधी काम के कारण, पार्टी से निकाले हुए ‘‘काली सांतरा’’ का जीवन। मैंने भैया से पूछा ‘‘तुमने पढ़ा है यह उपन्यास ?’’ हूँ, पढ़ूँगा क्यों नहीं। मेरी ही ज़िंदगी पर तो लिखी हुई है। में ही हूँ काली सांतरा। मैंने हैरान होते हुए पूछा &#8211; मगर उसको तो पार्टी से निकाल दिया गया था ? तो मैं भी तो एक्सपेल्ड हूँ। ‘‘कब से’’ ? ‘‘सालों हो गए।’’ लेकिन तुम तो अब भी स्टडी सर्कल चलाते हो। कॉलेज़ के नए कॉमरेड के गुरू हो ‘‘तो क्या हुआ ?’’ &#8220;मार्क़्सवाद से मेरी क्या दुश्मनी है?&#8221; फिर उन्होंने मुझसे पूछा ‘‘तुझे मेलाराम की याद है?’’ हाँ हाँ, पहले सरदार थे लेकिन फिर दाढ़ी &#8211; बाल कटवा लिए गए। और पार्टी ऑफ़िस में ही रहते थे। चाय बगान के यूनियनों के नेता। भैया बोले, ‘‘हाँ, पैंतालीस साल बाद उसे पार्टी से निकाल दिया गया था। पार्टी विरोधी काम के लिए। पिछले साल आया था यहाँ मुझसे मिलने । मैंने पूछा था ‘‘क्या करोगे अब ?’’ वह रोने लगा फूट-फूट कर। कहा &#8211; कॉमरेड, जैसे बहुत बड़े मेले में कोई बच्चा खो जाए, मेरी हालत वैसी ही है। मुझे अपना गाँव, अपना परिवार, अपने रिश्तेदार कोई भी याद नहीं। मैंने तो सबको भुला दिया था और सब मुझे भूल गए हैं। मैंने पूछा ‘‘जाओगे कहाँ, सोचा है कुछ ?’’ आँखें पौंछकर बोला ‘‘फिर से प्राइमरी मेंबरशिप ले लूँगा। अब पहले की तरह सख़्ती नहीं होती न। मेरी दुनिया तो वही है &#8211; पार्टी ऑफ़िस के कोने में पड़ी चारपाई और पार्टी का काम, चाहे वह कुछ भी हो।&#8221; गहरी उदासी से हमने बातचीत का रूख मोड़ दिया था।</p>
<p>और फिर एक दिन संझले भैया रिटायर हो गए। एक मकान उन्होंने भाभी के कहने पर बना लिया था लेकिन न कूलर, न टी.वी. और न कोई कनज़्यूमर कल्चर का सामान। ज़िंदगी भर साइकिल चलाते रहे। रिटायरमेंट के कुछ दिन पहले एक सैंकेड हैन्ड फ्रिज़ ख़रीद लिया था। एक अख़बार लेते थे, वह भी बंद कर दिया। इसी समय उनकी शादीशुदा बेटियों ने मौक़ा देख टी.वी. कूलर आदि सामान लाना शुरू कर दिया कि माँ के लिए है। तुम्हारी कॉमरेडी के चलते तो बेचारी इन चीज़ों से वंचित ही रही। अब तो थोड़ा आराम से रहने दो। झखमार कर भैया भी टी.वी. देखते और धुंआधार गालियाँ बकते कि किस तरह यह सड़ा गला उपभोक्तावाद नई पीढ़ी को खोखला कर देगा, कि टी.वी. में कभी कोई ग़रीब दीखता ही नहीं। न्यूज़ को छोड़कर। जैसे तो इस देश में ग़रीब हैं ही नहीं। &#8220;और सीरियल ? उनमें कंपनी, शेयर ख़रीदना, बड़ी नौकरियाँ, आलीशान घर और एक्स्ट्रा मेरिटल संबंध&#8221; संझले भैया गुस्से से फनफनाते।</p>
<p>कोई सालभर पहले संझले भैया को दिल का दौरा पड़ा। मिलने गई। अपने सोने के कमरे में खिड़की के पास पड़ी कुर्सी पर लुंगी बनियान पहने बीड़ी पीते हुए बैठे थे भैया। पास की मेज़ पर हृदय रोग की हिन्दी, अंग्रेज़ी, बांग्ला में ढेरों किताबें पड़ी थीं। मैंने कहा, ‘‘अब तो बीड़ी पीनी छोड़ दो भैया। ’’ भैया हंसे, कमज़ोर सी हंसी। बोले ‘‘हाँ डॉक्टर भी कह रहा था’’ &#8220;मास्साब, दिल और फेफड़े का बुरा हाल है। बीड़ी तो छोड़नी पड़ेगी और ड्रिंक भी एक दो पेग से ज़्यादा नहीं। मैंने डॉक्टर से कहा &#8220;भाई, यह बीड़ी तो मेरा चालीस साल का साथी है, इसे कैसे छोड़ दूँ। और उन्होंने आधी पी बीड़ी को एशट्रे में ठूंस दिया।</p>
<p>निन्यानवे के चुनाव हो रहे थे। भैया का फ़ोन आया। बड़ी उदास आवाज़ में बोले ‘‘वोट देकर आ रहा हूँ।’’ पहली बार हम लोगों ने कांग्रेस को वोट दिया। कोई चारा नहीं था। हाथ या कमल। मैंने कहा मैंने कहा ‘‘मैंने भी पहली बार आँख बंद कर ‘हाथ’ पर ठप्पा लगाया। पर मुझे ज़्यादा बुरा नहीं लग रहा भैया, ‘‘यू हैव टू चूज़ द लेसर ईविल।’’<br />
दिसम्बर के एक उजले इतवार को आख़िरी बार संझले भैया  से मिलने गई थी। उस छोटे से गंदे कस्बे में। इतनी गंद पचास सालों में। सड़कें ऊबड़-खाबड़, कूड़े के ढेर पर सूअर घूमते &#8211; लेकिन बड़ी-बड़ी कोठियाँ, सड़क के दोनों और कम्प्यूटर का साइबर कैफ़े, एस.टी.डी., आई.एस.डी. बूथों की दुकानों की भरमार। रिक्शा से उतरी तो भैया अपने घर के पास वाले पार्क में बिखरी पॉलीथीन की थैलियाँ उठा रहे थे। मैंने पूछा ‘‘यह क्या कर रहे हो ?’’ गंद साफ़ कर रहा हूँ। अमीर देशों का हम ग़रीब तीसरी दुनिया को वरदान के रूप में दिया हुआ अभिशाप’’</p>
<p>घर आकर उन्होंने मकान के पिछवाड़े लगी सब्जी की क्यारियाँ दिखाई। ‘‘आजकल यही करता हूँ’’ थोड़ी देर चुप रह कर बागवानी के सब नुस्खे बताने लगे। न पहले जैसा गुस्सा, न गालियाँ की बौछार। जैसे भैया ने हथियार डाल दिए थे। मैंने कहा ‘‘कुछ दिन बेटियों के घर रह आओ, चेन्ज हो जाएगा।’’ भैया ने तल्ख़ी से कहा, ‘‘कोई फ़ायदा नहीं, आइ ऐम डेस्टिंड टु डाई इन दिस डस्टी एण्ड डर्टी प्लेस’’। हैरानी हो रही थी मेरे कॉमरेड भैया ‘‘डेस्टिनि’’ की बात कर रहे हैं ? तब क्या &#8230;..?</p>
<p>दिसम्बर का आख़िरी दिन। गहरी धुंध से पूरा क़स्बा ढ़का हुआ। अंतिम यात्रा की तैयारियाँ हो रही है। उपस्थित लोगों में हर चीज़ में मतभेद हो रहा है। मोहल्ले के बंगाली अपने, रीति-रिवाज़ों की हिमायत कर रहे हैं और सारी ज़िंदगी जिनके साथ बिताई वे हरियाणा के पड़ोसी दोस्त अपने। ऐसा करो, ऐसा न करो। यह रीत है &#8211; हमारे में ऐसा नहीं करते। अरे सूरज डूब गया तो &#8230; जल्दी करो। अरे अग्नि देकर चले आना &#8230;. नहीं चिता बुझाकर उसी दिन फूल लाना होता है बंगालियों में &#8230; घी का डब्बा कहाँ है ? और चंदन की लकड़ी ? मैंने मन ही मन कहा ‘‘यह भी कोई बात हुई भैया ? बोलते  क्यों नहीं कुछ ? गालियों की बौछार कहाँ गई अब? हम सब बैठे हैं सुनने और तुम हो कि सीने पर दोनों हाथ बाँध आँखें बंद किए चुपचाप लेटे हो ?’’ सोच रही थी जिस आदमी ने ज़िंदगी भर कुछ नहीं माना उसके लिए क्या करना चाहिए? क्या सही है? जो मर गया उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ सब हो या जो रह गए उनकी उनके मन की खुशी के मुताबिक़ सब किया जाए – चेहरा ढ़क दो ‘‘हरियाणवी पड़ोसियों ने कहा।’’ नहीं नहीं चेहरा खुला ही होना चाहिए, बंगाली पड़ोसी बोले। बहसें होती गई। फिर कुछ देर बात हरियाणवियों ने मैंदान छोड़ दिया और अपने प्रियजनों के कंधों पर सवार संझले भैया चल दिए।</p>
<p>‘‘बोलो हरि, हरि बोल – बोलो हरि हरि बोल’’शावयात्रा काफ़ी आगे बढ़ गई थी। बोलो हरि &#8230; मुझे लगा अभी संझले भैया सर उठाकर दहाड़ उठेगें &#8211; यह क्या हो रहा है? बंद करो यह बक़वास – भाड़ में गया हरि और हरि बोल – अरे कमबख़्तों, मर गया हूँ तो क्या &#8230; हूँ तो अब भी कॉमरेड ही &#8230;</p>
<p>शवयात्रा गहरे धुंधभरी सड़क के मोड़ पर ओझल हो गई थी।</p>
<p>लेखिका &#8211; सांत्वना निगम<br />
सी-5 प्रेस एन्कलेव<br />
नई दिल्ली 110017</p>
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		<title>बीच का रास्ता नहीं होता, कॉमरेड!: ईश्वर दोस्त</title>
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		<pubDate>Sun, 23 May 2010 14:06:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Aditya Nigam</dc:creator>
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		<description><![CDATA[ईश्‍वर दोस्त का यह लेख क़ाफ़िला में कुछ अरसा पहले छपा था। ध्रुवीकरण की खासियत यह होती है कि वह बीच की जगह तेजी से खत्म करता जाता है। चाहे वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो या अस्मिता पर आधारित या किसी &#8230; <a href="http://kafilahindi.wordpress.com/2010/05/23/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%9a-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%89/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=35&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><em>ईश्‍वर दोस्त</em> </strong>का यह लेख <a href="http://kafila.org/2009/11/24/%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%9A-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%89/" target="_blank">क़ाफ़िला में कुछ अरसा पहले छपा था</a>।</p>
<p>ध्रुवीकरण की खासियत यह होती है कि वह बीच की जगह तेजी से खत्म करता जाता है। चाहे वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो या अस्मिता पर आधारित या किसी और मुद्दे पर। राज्य की दमनकारी हिंसा बनाम माओवादी हिंसा एक ऐसा ही ध्रुवीकरण है। इस सरलीकरण में छिपी राजनीति पर सवाल उठाना जरूरी हो गया है। युद्ध की भाषा बोलती और बंदूक को महिमामंडित करती इस राजनीति के निशाने पर क्या जनसंघर्षों की लोकतांत्रिक जगह नहीं है? माओवादियों के सबसे बड़े दल पीडब्ल्यूजी के नाम के साथ ही जनयुद्ध शब्द लगा हुआ है। छत्तीसगढ़ सरकार ने एक सरकारी जनयुद्ध को सलवा जुडूम के नाम से प्रायोजित किया हुआ है। केंद्र सरकार ने पहली बार माओवाद के खिलाफ युद्ध की शब्दावली का इस्तेमाल किया है, फिर उस पर सफाई भी दी है। अगर माओवाद लोकतंत्र के प्रति अपनी नफरत नहीं छिपाता तो उत्तर-पूर्व से लेकर गरीब आदिवासी इलाकों तक कई सरकारें भी राजनीतिक-सामाजिक गुत्थियों को महज सुरक्षा के सवाल में तब्दील कर बंदूक की नली पर टंगे विशेष सुरक्षा कानूनों के जरिए सुलझाना चाहती हैं।</p>
<p>अन्याय के खिलाफ जनलामबंदी, संघर्ष और प्रतिरोध की सुदीर्घ परंपरा को युद्ध के अतिरेक में ढांपने की कोशिश की जा रही है। युद्ध सीधा सवाल करता है कि तय करो किस ओर हो तुम? यह सवाल एक-दूसरे से युद्ध करता या उसके लिए पर तौलता कोई भी पक्ष किसी से भी पूछ सकता है।<br />
<span id="more-35"></span>जो लोग दोनों पक्षों से असहमत या किसी से कम किसी से ज्यादा असहमत होना चाहते हैं, वे स्वयं को दो पाटों के बीच पाते हैं। हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि आज के जमाने में दोस्ती के लिए दिल मिलना जरूरी नहीं, दुश्मन का दुश्मन दोस्त हो जाता है। आज परसाई होते तो एक और नजारा देखते। जो हमारे साथ नहीं है वह दुश्मनों के साथ है! सरकारें घोषणा करती हैं कि जो आदिवासियों पर सलवा जुडूम जैसे अर्द्ध-कानूनी गिरोहों के दमन का विरोध करते हैं, वे माओवाद के हमदर्द हैं। माओवादी फरमाते हैं कि जो उनके साथ नहीं हैं वे बुर्जुआ वर्ग के दलाल, वर्ग-शत्रु और घृणित उदारवादी हैं। अहिंसा, मानवता, उदारता, सहिष्णुता जैसे शब्द सुन माओवादी को हंसी आ सकती है। इन्हें बोलने वालों को वह मूर्ख या सत्ता का एजेंट या दोनों एक साथ मान सकता है।</p>
<p>‘बीच का रास्ता नहीं होता’! यह किसी क्रांतिकारी कविता का पोस्टर भर नहीं है। यही बात पूरे आत्मविश्वास से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश कह रहे थे। यह पंक्ति रोमांचित करती है और दुस्साहस के लिए तैयार करती है। इस पंक्ति पर बुश और अतिवाम विचार, दोनों मोहित हैं। क्योंकि यह पंक्ति सरलीकरण भी करती है, जो नवउदारवाद और माओवाद दोनों की राजनीतिक परियोजना के माफिक है। यह उसी तरह की अंतर्निर्भरता है, जो एक-दूसरे से टकराती दो कट्टरताओं में एक-दूसरे के लिए होती है। माओवाद को फैलने के लिए एक निरंकुश राजसत्ता चाहिए। राजसत्ताओं को नागरिक अधिकारों के अपहरण के लिए, जनविरोधी कानून बनाने के लिए माओवाद जैसे दुश्मन चाहिए। एक दमनकारी सरकार माओवाद की हिंसा को आकर्षक बनाती है। एक हिंसक छापामार युद्ध राजसत्ता की हिंसा की वैधता बन जाता है। एक के पास संविधान की मनचाही व्याख्या और औपनिवेशिक कानूनों की विरासत है तो दूसरे के पास समाजवाद के उस अधिनायकवादी और सर्वसत्तावादी संस्करण की फंतासी है, जो चीन में सचमुच में नवउदारवाद में ही तब्दील हो गया है।</p>
<p>कांग्रेस और भाजपा में से किसका पक्ष लेंगे? इस प्रश्न पर वामपंथियों का काफी समय और ऊर्जा जाती है। जो दोनों को ही नहीं चुनना चाहते, वे क्या करें? जो वाम दलों का समर्थन करते हुए भी उनकी आलोचना करते रहना चाहते हैं, वे क्या करें? जो आदिवासियों के प्रति हो रहे अन्याय और माओवाद, दोनों के विरोध में हैं, वे क्या करें?  ऐसे लोगों के लिए भी कोई राजनीतिक वक्त ऐसा आ सकता है जब दो बड़े पक्षों में से किसी एक के खिलाफ ज्यादा बोलना पड़े। आपातकाल में इंदिरा गांधी की तानाशाही का विरोध करते हुए समाजवादियों के एक हिस्से ने संघ वालों को अपने साथ खड़ा होने दिया। राजीव गांधी के खिलाफ आंदोलन करते हुए वाम ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि भाजपा भी इसी मुद्दे पर आंदोलन कर रही है। बाबरी मस्जिद गिरने या गुजरात दंगों के बाद उन सेकुलरवादियों को भी कांग्रेस से राहत मिली जो उसे सख्त नापसंद करते थे।</p>
<p>इसी तरह जब केंद्र सरकार ने आदिवासी इलाकों में माओवादियों के खिलाफ युद्ध करने की घोषणा की तो आदिवासी प्रश्न पर सोचने वालों के लिए यह साफ था कि इससे छापामारों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा, मगर आदिवासी इलाके तबाह हो जाएंगे। आंकड़े बताते हैं कि सलवा जुडूम के बाद से माओवादियों की ताकत और हिंसा बस्तर में कई गुना बढ़ गई है। कई हजार आदिवासी शिविरों में ले आए गए। कई हजार डर कर और बच कर पड़ोसी राज्यों की तरफ भाग खड़े हुए। कई हजार माओवादियों के तर्क या बंदूक के असर में आ गए या ले आए गए। जिन लोगों ने सरकार के युद्ध के एलान का पुरजोर विरोध किया उनमें कई गांधीवादी, समाजवादी, सर्वोदयवादी हैं। ये देख चुके हैं कि कैसे उत्तर पूर्व में सेना की कार्रवाई और आतंकवाद एक दुश्चक्र बन चुका है। युद्ध के विरोध में भाकपा जैसे वे दल भी हैं जो माओवादियों का निशाना रहे हैं। जो किसी जंगल में कभी सिर्फ इसी कारण माओवादियों की गोली का शिकार हो सकते हैं कि वे भाकपा जैसी ‘संशोधनवादी’   कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं। हाल में गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि हमने कभी युद्ध की बात नहीं की, यह मीडिया की उपज थी। उनका यह स्पष्टीकरण नागरिक समाज के दबाव का नतीजा है या झारखंड में आसन्न चुनावों की मजबूरी का? यह चिदंबरम की सदाशयता है या अधूरे बंगाल मिशन के चलते तृणमूल कांग्रेस का दबाव? इसका पता चलना फिलहाल मुश्किल है। तब तक बुद्धिजीवी चाहें तो खुशफहमी में रह सकते हैं। सरकार के युद्ध-एलान के विरोध के दौरान ही कथित ‘जनयुद्ध’ के पक्ष में मिथक गढ़ने की कोशिश भी हुई। कहा गया आदिवासियों ने बंदूक उठा ली है। यह नहीं पूछा गया कि तो क्या आंध्र के आदिवासियों ने बंदूकें रख दी हैं। आदिवासियों के साथ हुआ अन्याय और पीडब्ल्यूजी की हिंसा आधारित राजनीतिक विचारधारा दो अलग बातें हैं। माओवादियों के कब्जे और दखल का जितना इलाका है, उससे कहीं ज्यादा बड़े इलाके में आदिवासियों के लोकतांत्रिक आंदोलन चल रहे हैं, जो न सिर्फ उनके शोषण और दमन बल्कि विरोध के हिंसावादी रास्ते के भी खिलाफ हैं, जिन्होंने कई बार बहादुरी से सरकारी गोलीबारी झेली है, जिन्होंने कई बार राजसत्ता की बंदूक को जन आंदोलन की ताकत से झुकाया है।</p>
<p>जो लोग ‘चिदंबरम के युद्ध’ का या किसी ऑपरेशन ग्रीनहंट का विरोध कर रहे हैं और एकदम सही विरोध कर रहे हैं, वे ऐसा राजसत्ता की गोद में बैठ कर तो शायद नहीं कर रहे होंगे! वे किसी युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि लोकतंत्र की उसी जगह पर बैठ कर विरोध कर रहे हैं, जो जनता ने अनवरत संघर्षों के बाद हासिल की है, जिसकी आजादी के बाद से लगातार हिफाजत की है और जो व्यवस्था परिवर्तन के उनके संघर्ष की बुनियाद है। लोकतंत्र और असहमति की जगह जितनी आज है उससे बड़ी होनी चाहिए। यह है कानून का रस्सा तुड़ा कर भागती राजकीय हिंसा और न्याय के नाम पर की जा रही दुस्साहसवादी हिंसा के बीच की जगह। दोनों तरह की हिंसाएं जनवाद, न्याय, शांति जैसे मूल्यों को उनसे जुड़ी विडंबनाओं का हवाला देकर अपने अस्त्रागार में शामिल करती चलती हैं। जिस तरह आदिवासियों ने भारतीय राजसत्ता के बांध, खदान, कारखाने और अभयारण्य के लिए ‘जरूरी’ विस्थापन वाले उस विकास को नहीं चुना, जो निरंतर उनकी जमीन और जंगलों पर कब्जा करता गया, उसी तरह उन्होंने माओवादियों और उनकी बंदूक को नहीं चुना। क्या बंदूक चुनने का मौका देती है? केंद्र सरकार कहती है कि माओवादी न हों तो आदिवासियों का विकास कर दें। ऐसा है, तो पहले बुंदेलखंड में और तमाम शहरों की गंदी बस्तियों में क्यों नहीं विकास कर देते? सरकार कहती है कि हम जमीन, जंगल के सवाल पर माओवादियों से बात करने को तैयार हैं। सरकार को आज बस्तर में सरकार के खिलाफ निहत्थे खड़े मनीष कुंजाम और रामनाथ सरफे से, ओडीशा, नर्मदा घाटी, विदर्भ के शांतिपूर्ण जन आंदोलनों से बात करने से किसने रोका है? चंबल में रह रहे और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भुखमरी का सामना कर रहे सहरिया आदिवासियों के साथ क्या तब बात करेंगे जब कोई जागरूक डकैत उनके मुद्दे को उठाएगा? सरकार आज तक मेधा पाटकर, बीडी शर्मा, सुनील या बिजय भाई से आदिवासियों की स्थिति की समझ क्यों नहीं ले पाई। क्या बातचीत की मेज तक एकमात्र रास्ता हथियारों से होकर जाता है?</p>
<p>बंगाल में माओवादियों के हाथों मरते माकपा के कार्यकर्ता मानव अधिकार के विमर्श से बाहर हैं। उनके परिवारों के आर्तनाद मीडिया से, ‘क्रांतिकारी’ बहसों से बाहर हैं। उनकी चीखें ‘बुद्धि’-जीवियों के हृदय को नहीं जगातीं। वे बंगाल के सत्ता परिवर्तन की जरूरी कीमत चुकाने के लिए पैदा हुए थे। वे एक हारती हुई, पिटती हुई पार्टी के सदस्य हैं। यह सही है कि माकपा अपनी नवउदारवादी फिसलन के चलते बंगाल में लगातार चुनाव हार रही है। मगर क्या किसी हारती हुई पार्टी के कार्यकर्ताओं को इस तरह खत्म किया जाना चाहिए? लोकतंत्र में कौन नहीं हारता? और हाशिए के आंदोलन तो चुनावी राजनीति में जगह ही नहीं बना पाते। बंगाल में कार्यकर्ता कांग्रेस या तृणमूल के नहीं, माकपा के मारे जा रहे हैं। पर चिदंबरम उलटे माकपा पर बरसते हैं। अजीब नजारा है। माओवादी ममता के बाएं बाजू खड़े हैं। मनमोहन और चिदंबरम दाएं बाजू खड़े हैं। मीडिया लगातार बेचैनी के साथ पुलिस की बंदूक और माओवादी के कंधे पर टंगी बंदूक के बीच पैन शॉट निकाल रहा है। अतिरेक बिकता है। भाकपा, नर्मदा बचाओ आंदोलन, आदिवासी मुक्ति मोर्चा, समाजवादी जनपरिषद, माले (दीपंकर) आदि के पक्षों से टीआरपी नहीं बनेगी। बुर्जुआ लोकतंत्र को ठीक करने के दो तरीके हो सकते हैं। एक तो यह कि इसे ज्यादा जनवादी और पुख्ता बनाया जाए। दूसरा यह कि इसे खत्म कर, इस पर कब्जा कर तानाशाही के रास्ते पर जाया जाए, जो रास्ता अनवरत कुर्बानियों को किसी सेना या किसी गुट के हवाले कर देता है। मगर समाजवादी लोकतंत्र का रास्ता कहां है? इक्कीसवीं सदी के समाजवाद का यह प्रश्न मुंह बाए खड़ा है, जिसका मुकाबला वाम विचार को करना है। माकपा को यह सोचना होगा कि वह स्तालिनवादी तानाशाही के खिलाफ नहीं बोलेगी तो माओवाद से विचारधारा का संघर्ष कैसे कर पाएगी? जैसे स्टालिन ने समाजवाद के लिए हजारों ‘संदिग्ध’ कम्युनिस्टों को मरवा दिया, माओवादी क्या ठीक वैसे ही संशोधनवादी माकपा कार्यकर्ता को मरवा रहे हैं? वाम मोर्चे के दल समाजवादी लोकतंत्र के सवाल को रणनीति के सवाल के रूप में छोड़ नहीं सकते। उन्हें ‘समाजवाद में मानवाधिकार’ को लेकर अपना रुख साफ करना होगा। वरना उनके लिए भी ‘बुर्जुआ’ मानवाधिकार रणनीति का एक औजार मात्र रहेगा, जिस वैचारिक स्थिति के चलते बहुत से मानवाधिकारवादी माकपा के मरते लोगों से मुंह फेर लेते हैं।</p>
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		<title>सुन ओ बेरहम…: पॉल रॉबसन के &#8216;ओल मैन रिवर&#8217; और भूपेन हाजरिका के &#8216;बिस्‍तीर्ण दुपारे&#8217; की तर्ज़ पर</title>
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		<pubDate>Sun, 23 May 2010 10:32:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Aditya Nigam</dc:creator>
				<category><![CDATA[Culture]]></category>
		<category><![CDATA[Movements]]></category>
		<category><![CDATA[Struggles]]></category>
		<category><![CDATA[Bhupen Hazarika]]></category>
		<category><![CDATA[Bistirno Dupare]]></category>
		<category><![CDATA[Ol' Man River]]></category>
		<category><![CDATA[Paul Robson]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8216;ओल मैन रिवर&#8217; एक अमरीकी लोकगीत था जो दक्षिणी अमरीका के मिसिसिपी नदी वाले इलाक़ों में गाया जाता था। वैसे मूलत: यह गीत एक मशहूर रूसी लोकगीत &#8216;साँग ऑफ़ द वॉलगा बोटमेन&#8217; का अमेरिकी संस्करण माना जाता है।  दक्षिण अमरीका &#8230; <a href="http://kafilahindi.wordpress.com/2010/05/23/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%93-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e2%80%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%89%e0%a4%b2-%e0%a4%b0%e0%a5%89%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%93-2/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=31&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste">
<div id="_mcePaste">&#8216;ओल मैन रिवर&#8217; एक अमरीकी लोकगीत था जो दक्षिणी अमरीका के मिसिसिपी नदी वाले इलाक़ों में गाया जाता था। वैसे मूलत: यह गीत एक मशहूर रूसी लोकगीत &#8216;साँग ऑफ़ द वॉलगा बोटमेन&#8217; का अमेरिकी संस्करण माना जाता है।  दक्षिण अमरीका के मिसिसिपी के आसपास के  इलाक़ों में ग़ुलामी का बोलबाला बहुत दिनों तक बना रहा। लिहाज़ा, इस गीत को पॉल रॉबसन ने ग़ुलामी के संदर्भ में नए सिरे ढाला। मिसिसिपी के ग़फ़लतज़दा अंदाज़ को रॉबसन ने ग़ुलामी के प्रति उसकी बेरुखी के रूप में पेश किया। कोलम्बि‍या युनिवर्सिटी में पढ़ते हुए भूपेन हाज़रिका की मुलाक़ात रॉबसन से हुई और इस गीत से वे इतना मुतास्सिर हुए कि उन्होंने उसे अपनी ज़ुबान, अहमिया में &#8216;बिस्तीर्ण पारोरे&#8217; के रूप में अडैप्ट कर लिया। मिसिसिपी की जगह उनका वह गीत ब्रह्मपुत्र को सम्बोधित करता है। बाद में उन्हीं ने इसे बांग्ला में तरजुमा किया जो गंगा से मुखातिब है। अपने कुछ पुराने दोस्तों के आग्रह पर मैंने इसे हाल में हिन्दुस्तानी में ढालने की कोशिश की। पता नहीं उन्हें कितनी पसंद आई, मगर जैसी भी है, पेश है:</div>
<div></div>
<div id="_mcePaste">
<div id="_mcePaste">सुन ओ बेरहम/ तेरे दोनों पार/ मचा हाहाकार</div>
<div id="_mcePaste">औ’ तू बेख़बर/ चुपचाप मगर/ ओ गंगा बहती है क्यों?</p>
</div>
<div id="_mcePaste">दीन धरम/ बरबाद हुए/ मानवता तबा(ह) हुई</div>
<div id="_mcePaste">बेशर्म काहिल सी तू बहती है क्यों?</div>
<div id="_mcePaste">हौसले बढ़ा/ दीवाना बना / लोग बेशुमार करें इंतजार/</div>
<div id="_mcePaste">लहरों में तरंग/ मन में उमंग/ जगाती नहीं है क्यों?</p>
</div>
<div id="_mcePaste">फ़ाक़ों के मारे हुओं/ अँधेरों में भटके हुओं-के</div>
<div id="_mcePaste">अंधेरानशीनी पे मौन है क्यों?</div>
<div id="_mcePaste">हौसले बढ़ा/ दीवाना बना / लोग बेशुमार करें इंतजार/</div>
<div id="_mcePaste">लहरों में तरंग/ मन में उमंग/ जगाती नहीं है क्यों?</p>
</div>
<div id="_mcePaste">इंसान अगर ख़ुदग़र्ज़ हुआ/ सामाज अगर बेगाना हुआ</div>
<div id="_mcePaste">तो ऐसे बेजान समाज को ढहाए ना क्यों?</div>
<div id="_mcePaste">हौसले बढ़ा/ दीवाना बना / लोग बेशुमार करें इंतजार/</div>
<div id="_mcePaste">लहरों में तरंग/ मन में उमंग/ जगाती नहीं है क्यों?</p>
</div>
<div id="_mcePaste">तू बेदर्द इठलाती चले/ दिन-रात युँही बल खाती चले</div>
<div id="_mcePaste">सीने में सदियों के राज़ लिए</div>
<div id="_mcePaste">आग लगी है/ कुहराम मचा है</div>
<div id="_mcePaste">अँधेरों से निकलते हुए लाखों-करोड़</div>
<div id="_mcePaste">शोषितों के जश्‍न से तू अंजान है क्यों?</div>
</div>
</div>
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			<media:title type="html">Aditya</media:title>
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	</item>
		<item>
		<title>सूनी राहों पर &#8211; बॉब डिलन के गीत की तर्ज़ पर</title>
		<link>http://kafilahindi.wordpress.com/2008/11/19/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%89%e0%a4%ac-%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97/</link>
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		<pubDate>Wed, 19 Nov 2008 11:14:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Aditya Nigam</dc:creator>
				<category><![CDATA[Culture]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>

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		<description><![CDATA[1980 के दशक के दौरान बॉब डिलन के इस मशहूर गाने का तरजुमा परचम मंडली के लिए किया गया था। इधर दो दशक से भी ज़्यादा समय ग़ुज़र जाने के बाद अपने चंद रैडिकल युवा साथियों के आग्रह पर उस &#8230; <a href="http://kafilahindi.wordpress.com/2008/11/19/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%89%e0%a4%ac-%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=13&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>1980 के दशक के दौरान बॉब डिलन के इस मशहूर गाने का तरजुमा <em>परचम</em> मंडली के लिए किया गया था। इधर दो दशक से भी ज़्यादा समय ग़ुज़र जाने के बाद अपने चंद रैडिकल युवा साथियों के आग्रह पर उस पर दोबारा निगाह डालने पर लगा इस पर काफ़ी काम की ज़रूरत है। लिहाज़ा कुछ और सफ़ाई कर के छाप रहा हूँ। लोकेश और नवीन को इसके लिए ख़ास तौर पर शुक्रिया।<br />
(<strong>बॉब डिलन</strong> के गीत <em>&#8216;द आन्सर इज़ ब्लोइं इन द विंड&#8217;</em> से प्रेरित)</p>
<p>सूनी राहों पर कोई कब तक चले<br />
इससे पहले वो इंसाँ कहलाए?<br />
कितने सागर कोई फ़ाख़्ता उड़े<br />
इससे पहले कि वो चैन पाए?<br />
बारूद की बू फैली हर इक ओर<br />
कैसे यारों अमन आने पाए?<br />
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा<br />
फ़िज़ाओं में जवाब मिलेगा।</p>
<p>कितने बरस कोई पर्वत टिके<br />
इससे पहले कि वो मिट जाए?<br />
कितने युगों तक करें इंतज़ार<br />
जब आज़ादरूहों की उठेगी फ़रियाद?<br />
कब तक आख़िर कोई मुँह फेर कर<br />
हक़ीक़त से दामन बचाए?<br />
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा<br />
फ़िज़ाओं मे जवाब मिलेगा।</p>
<p>जंग के बादल हैं फैले हर सू<br />
अँधेरों में ढका आसमान<br />
और तबाही मची है घर घर में<br />
आँखें अपनी खोलो ज़रा<br />
औ&#8217; कितनी और लाशों के अम्बार लगें<br />
इससे पहले कि आप जान पाएँ?<br />
हवाओं में यारों जवाब मिलेगा<br />
फ़िज़ाओं में जवाब मिलेगा।</p>
<p><strong>मूल अंगरेज़ी के बोल इस तरह हैं</strong>:</p>
<p><span id="more-13"></span>How many roads must a man walk down<br />
Before you call him a man?<br />
Yes, n how many seas must a white dove sail<br />
Before she sleeps in the sand?<br />
Yes, n how many times must the cannon balls fly<br />
Before theyre forever banned?<br />
The answer, my friend, is blowin in the wind,<br />
The answer is blowin in the wind.</p>
<p>How many times must a man look up<br />
Before he can see the sky?<br />
Yes, n how many ears must one man have<br />
Before he can hear people cry?<br />
Yes, n how many deaths will it take till he knows<br />
That too many people have died?<br />
The answer, my friend, is blowin in the wind,<br />
The answer is blowin in the wind.</p>
<p>How many years can a mountain exist<br />
Before its washed to the sea?<br />
Yes, n how many years can some people exist<br />
Before theyre allowed to be free?<br />
Yes, n how many times can a man turn his head,<br />
Pretending he just doesnt see?<br />
The answer, my friend, is blowin in the wind,<br />
The answer is blowin in the wind.</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kafilahindi.wordpress.com/13/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kafilahindi.wordpress.com/13/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kafilahindi.wordpress.com/13/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kafilahindi.wordpress.com/13/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kafilahindi.wordpress.com/13/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kafilahindi.wordpress.com/13/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kafilahindi.wordpress.com/13/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kafilahindi.wordpress.com/13/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kafilahindi.wordpress.com/13/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kafilahindi.wordpress.com/13/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kafilahindi.wordpress.com/13/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kafilahindi.wordpress.com/13/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kafilahindi.wordpress.com/13/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kafilahindi.wordpress.com/13/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=13&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>हिन्दी के वर्जित प्रदेश में&#8230;</title>
		<link>http://kafilahindi.wordpress.com/2008/11/11/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ae/</link>
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		<pubDate>Tue, 11 Nov 2008 04:37:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Aditya Nigam</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bad ideas]]></category>
		<category><![CDATA[Culture]]></category>
		<category><![CDATA[Debates]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[अनुवाद]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[समाज विज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दुस्तानी]]></category>

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		<description><![CDATA[[यह लेख कुछ अरसा पहले वाक् पत्रिका के लिए लिखा गया था - पुराने दोस्त सुधीश पचौरी के इसरार पर। जब यह लेख लिख रहा था तब से अब तक हालात कुछ बदल चुके हैं। इसे लिखते वक़्त तक भी &#8230; <a href="http://kafilahindi.wordpress.com/2008/11/11/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ae/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kafilahindi.wordpress.com&amp;blog=3515837&amp;post=7&amp;subd=kafilahindi&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><em>[यह लेख कुछ अरसा पहले वाक् पत्रिका के लिए लिखा गया था - पुराने दोस्त सुधीश पचौरी के इसरार पर। जब यह लेख लिख रहा था तब से अब तक हालात कुछ बदल चुके हैं। इसे लिखते वक़्त तक भी मुझे यह गुमान था कि शायद एक रोज़ मैं हिन्दी के क़िलानुमा परिसर में घुस पाने क़ामयाब हो पाउंगा। हज़ार पहरों में घिरे इस क़िले में एक रोज़ ज़रूर दाखिल होने का मौक़ा मिलेगा। मगर इधर कुछ समय से ऐसा लगने लगा है कि यह क़त्तई मुमकिन नहीं है। हिन्दी के पहरेदार ऐसा कभी न होने देंगे। लिहाज़ा अब इस क़िले में घुसने की कोशिश छोड़ कर हिन्दुस्तानी के खुले और बे-पहरा मैदान में, खुली हवा में टहलना चाहता हूँ। कह देना चाहता हूँ पहरेदारों से कि मैं आप के मुल्क का बाशिंदा नहीं हूँ। मैं एक लावारिस मगर आज़ाद ज़ुबान में पला बढ़ा और वही मेरी ज़मीन है। अलविदा। - आदित्य निगम]<br />
</em></strong><br />
एक ज़माना हुआ हिन्दी से जूझते हुए। यह दीगर बात है कि हिन्दीवालों को इसकी ख़बर तक नहीं। हो भी क्यों? आप बेचते ही क्या हैं?<br />
िन्दी ख़ित्ते में पैदा हुए, पले-बढ़े और इसी आबोहवा में उम्र बिता दी मगर फिर भी, हुज़ूर, हमें हिन्दी की तमीज़ न आई। आज भी इस भाषाई क़िले का कोई न कोई पहरेदार, किसी न किसी &#8216;अशुद्धि&#8217; को लेकर टोक ही देता है। मगर अक्‍सर &#8216;हिन्दी सप्ताहों&#8217; और पखवाड़ों के दौरान जब बैंकों की दीवारों पर लिखी वो इबारतें देखता हूँ जो ग्राहकों को &#8216;चेक हिन्दी में भरने&#8217; की दावत दे रही होती है, तो थोड़ी बहुत तसल्‍ली ज़रूर हो जाती है। लगता है कि मैं अकेला नही हूँ। चलिए, हमें तो हिन्दी न आई, मगर बाक़ियों को क्या हो गया? वे क्यों हिन्दी में एक चेक तक नहीं भरते? क्यों इस तरह उनका आह्वान करना पड़ता है? ख़ुद अपनी ज़बान से यह बेदिली कैसी? क्या हुआ उस भाषा को जो हम सब की राष्‍ट्रीय अस्‍मिता को परिभाषित करने की महत्‍वाकांक्षा लेकर मैदाने-जंग में उतरी थी? पिछले सौ-सवा- सौ सालों में कितनों को धराशायी किया इस हिन्दी के रणबाँकुरों ने! क्यों आज वह अपनों से ही इस तरह कट-सी गई है कि उसे इस तरह न्योते बाँटने पड़ रहे हैं? ऐसे ही उलझे हुए सवालों से पिछले सालों में कई बार रूबरू होना पड़ा है, लगातार अपने बरतने लायक़ एक ज़बान की तलाश करते हुए।<br />
बात पुराने ज़माने की है। एक पैसा और पाँच पैसे के सिक्के चला करते थे उन दिनों। चवन्‍नी में चारमीनार सिगरेट का पैकेट आ जाया करता था। जी, हमारी नौजवानी के दिन। 1970 का वह दौर जो उन दिनों तो एक अलग ही मायने रखा करता था। दुनिया को बदल डालने की ख़्‍वाहिश, इंक़लाब का जुनून हम सब के सर पर सवार था। चारू मजुमदार का आह्वान था और हममें उनके नक़्‍शे-कदम पर चल कर एक नई दुनिया बनाने की तमन्‍ना। बस फिर क्या था? कमर कस कर कूद पड़े थे मैदान में। लेकिन ख़ुदा का लाख शुक्र है कि जल्द ही यह समझ में आ गया कि इंक़लाब चंद जाँबाज़ लोग नहीं, अवाम किया करती है। और अवाम है कि सोई पड़ी है। उसे इस बात का कोई इल्म ही नहीं कि इतिहास ने उसके कँधों पर कितनी बड़ी ज़िम्‍मेदारी डाल रखी है। लिहाज़ा अब यह हमारा, इतिहास के कारिंदों का, नए ज़माने के हरकारों का काम हुआ कि सोती हुई जनता को जगाएँ। उसे उसकी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी का अहसास दिलाएं।</p>
<p>तो क़िस्सा यहाँ से शुरू होता है। इस मुई सोई हुई जनता को कैसे जगाया जाए? ज़रूरत है उससे मुख़ातिब होने की। तो फिर परचे निकालिए, मीटिंगें कीजिए, जलसे-जुलूस आयोजित कीजिए। यहीं से शुरू होती है उत्तर-औपनिवेशिक दर्द की एक लम्बी दास्‍तान। मुख़्‍तसर में कहूँ तो तमाम उत्तर-औपनिवेशिक समाजों में हम-जैसा एक बड़ा तबक़ा है जो, अगर एलबर्ट मेम्मी या फ़्रान्ज़ फ़ानों के शब्‍दों में कहा जाए, तो सांस्‍कृतिक रूप से अपाहिज है। वह अपनी भाषा और उसकी सांस्‍कृतिक ज़मीन से कट चुका है। वह अंग्रेज़ी या फ़्रांसीसी में बोलने और लिखने-पढ़ने के लिए अभिशप्त है। उत्तर-औपनिवेशिक दुनिया का बुद्धिजीवी हमेशा एक सांस्‍कृतिक स्किट्ज़ोफ़्रेनिया में जीता है। यह हमारी नियति है। ख़ासकर रैडिकल बुद्धिजीवियों की &#8211; जो अपने कमरों में बैठ कर मनन-चिंतन करने की बनिस्बत दुनिया को बदलने की तमन्ना रखते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों को हमेशा अवाम से मुख़ातिब होने में दिक़्कतें पेश आतीं हैं। उन्हें हर वक़्त इस संवाद के लिए ज़बान तलाशनी होती है। अक्सर बनानी होती है। और नेहरूई ज़माने के &#8216;थ्री लैंग्‍वेज फ़ॉर्मूला&#8217; से निकले हम लोग तो किसी भी भाषा के लायक़ नहीं रह गए थे। हमें तो एक बरतने लायक़ भाषा तलाशने के लिए कहीं ज़्यादा मशक्क़त करनी पड़ी थी।</p>
<p><span id="more-7"></span>शुरू में तो भाषा की इस कमज़ोरी को मैं अपनी ही ख़ामी मानता रहा मगर आगे चलकर यह अहसास हुआ कि दरअसल यह एक आम दशा है। हिन्दी में चेक ज़्‍यादातर हिन्दीभाषी भरना नहीं जानते। लेकिन मेम्मी और फ़ानों की समस्‍या तो कमोबेश हर भारतीय भाषा पर लागू होती है &#8211; बांगला, मलयालम, तमिल, मराठी आदि। हिन्दी की दिक़्क़त एक और दर्जा ऊँची है, जिसका ज्ञान मुझे आगे चलकर हुआ।<br />
तो हुज़ूर, जनता से मुखातिब होने का सिलसिला परचों से शुरु हुआ। दिल्ली में होने के कारण हिन्दी में परचे लिखने का काम पहले युनिवर्सिटी में और फिर बस्तियों और यूनियनों के मज़दूरों में शुरू हुआ। इलाक़ों और यूनियनों में तो वाचिक परम्परा का ज़ोर ज़्यादा था &#8211; लिहाज़ा सीधे-सीधे बोलना अक्सर ‍ज़्यादा ज़रूरी हो जाता था। स्कूल में सीखी गई हिन्दी मैं जब भी बोलने की कोशिश करता तभी मुझे ऐसा लगता जैसे लोग मेरी तरफ़ कुछ इस अंदाज़ में देख रहे हैं गोया मैं सीधे चाँद से उतर कर आया हूँ। अक़्सर मुझे ऐसा लगता जैसे मानसिक रूप से वे उसी बीच कहीँ और विचरने चले गए हैं। अपनी बात कैसे कही जाए यह सवाल हमेशा बना रहता था। बाद में जब मुझे अकादमिक काम से जुड़ने का और उस क्षेत्र में हिन्दी की पाठ्‍य सामग्री तैयार करने का मौक़ा मिला तब तो यह दिक़्क़त इतनी बड़ी हो गई थी कि उसकी तुलना में मुझे ऐसा लगने लगा था कि &#8216;वो दिन भी क्‍या दिन थे&#8217; &#8211; सियासत करते हुए जैसे कभी ऐसी दिक्‍क़तें सामने ही नहीं आईं। मगर अब सोचता हूँ तो लगता है कि वो दिक़्क़तें दोनों अवस्थाओं में थीं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि सियासत करते समय विचारधारात्‍मक घुट्‍टी पिलाने वाली बैठकों में यह परेशानी ज़्यादा पेश आती थीं, रोज़ाना के कामकाज में उतना नहीं।<br />
बहरहाल, एक अर्थ में मेरी हिन्दी ऐसे ही तजुरबों के बीच बनी &#8211; लगातार शब्द टटोलते रहने के बीच, कभी फ़िल्मी गानों का सहारा लेकर, तो कभी अपने बस्तियों के साथियों द्वारा इस्तेमाल किए गए अल्‍फ़ाज़ ध्यान से सुनकर। तब मैंने पाया कि एक बहुत बड़ा शब्‍द-भंडार है जो इधर-उधर बिखरा पड़ा है, मगर जिसे हमारी स्कूली हिन्दी से जलावतन कर दिया गया है। ऐसा क्‍यों हुआ इसका हमें कोई अंदाज़ा नहीं था। बहुत साल बाद चलकर यह अहसास हुआ कि ये ऐसे शब्द थे जो हिन्दी के एक ऐसे अतीत की याद दिलाते थे जिससे निजात पाने के लिए हमारे रणबाँकुरों ने सौ साल से ज़्यादा तक भाषा को मैदाने-जंग में बदल कर रख दिया था। कभी-कभी ऐसा लगने लगा था जैसे हिन्दी और उसके योद्धाओं ने उर्दू का कोई नुक़सान किया हो न हो, ख़ुद अपने पैरों पर तो कुल्‍हाड़ी मार ही ली है। ख़ुद को पूरी तरह अपंग बना लिया है।</p>
<p>इस ज़माने में मैं दिल्ली नगर निगम के पानी के महकमे की यूनियन में काम किया करता था। उस ज़माने में इस महकमे का नाम था &#8216;दिल्ली जल प्रदाय व मल व्ययन संस्‍थान&#8217;। हमारी यूनियन के सदस्य अमूमन अनपढ़ बेलदार हुआ करते थे जिन्हें मैंने पाँच साल में कभी उस संस्थान का नाम लेते नहीं सुना। यह महकमा उन के लिए हमेशा &#8216;वाटर सप्लाई&#8217; ही रहा। वाटर सप्लाई की यूनियन में बिताए अपने पूरे वक़्त में मैंने किसी मज़दूर को &#8216;अधिशासी अभियन्‍ता&#8217; या &#8216;कनिष्‍ठ अभियन्‍ता&#8217; कहते नहीं सुना। हमेशा जे ई (जूनियर इंजीनियर) या &#8216;एकशन&#8217; (एक्‍ज़िक्‍यूटिव इंजीनियर का लघु, मगर &#8216;अपभ्रंश&#8217; रूप) ही इस्तेमाल किया जाता था।<br />
उन दिनों का तजुरबा ताउम्र मेरे साथ रहे यही लाज़मी था। एक बात तो समझ में आ ही गई थी: राजभाषा कमेटियों और तमाम आचार्यों के सारे प्रयास ज़मीन पर उतरते ही औंधे मुँह गिरते हैं। उनका कोई ख़रीदार नहीं है। मज़े की बात यह है कि अपने हिन्दीदाँ दोस्तों से मैंने जब भी हिन्दी की दुरूहता का ज़िक्र किया तो उन्‍होंने मुझे ये समझाने की कोशिश की कि मेरा यह सवाल महज़ &#8216;अंगरेज़ीदाँ&#8217; बुद्धिजीवियों के दुराग्रह का नतीजा है। उनका कहना था कि ऐसे बुद्धिजीवियों को &#8216;क्लिष्‍ट अंगरेज़ी&#8217; से तो कोई ग़ुरेज़ नहीं होता मगर हिन्दी का सवाल उठते ही वे उसकी क्लिष्‍टता का मसला उठा देते हैं। मैं आज तक उन्हें यह समझा पाने में असमर्थ रहा हूँ कि ये सवाल अंगरेज़ीदाँ लोगों का नहीं, ख़ुद हिन्दी की पब्लिक का है। अगर एक निरक्षर बिहारी या गढ़वाली मज़दूर की ज़ुबान पर &#8216;वाटर सप्‍लाई&#8217; ज़्‍यादा आसानी से चढ़ता है तो क्या इससे सोचने लायक़ कुछ सवाल पैदा नहीं होते?</p>
<p>ख़ैर, ज़िन्दगी का वह एक पड़ाव भर था। ख़‍त्म हुआ। अगला पड़ाव भी आ ही गया।<br />
1990 से 1992 के दरमियान, सोलह साल राजनीतिक कार्यकर्त्ता के रूप में काम करने के बाद, मुझे इंदिरा गाँधी मुक्त (?) विश्वविद्यालय (इगनू) के राजनीतिशास्त्र विभाग में हिन्दी पाठ्‍य-सामग्री तैयार करने की ज़िम्मेदारी मिली। चलते-चलते यहाँ इस &#8216;मु‍क्त&#8217; शब्द पर भी ग़ौर फरमाते चलें। अंग्रेज़ी के &#8216;ओपन युनिवर्सिटी&#8217; का यहाँ &#8216;मुक्त विश्‍वविद्यालय&#8217; के रूप में तरजुमा किया गया है। ग़ौरतलब है कि कि यहाँ &#8216;ओपन&#8217; का आशय विश्‍वविद्यालय की मुक्ति या आज़ादी से नहीं बल्‍कि उन शिक्षार्थियोँ/ तालिब-इल्‍मों की &#8216;मुक्ति&#8217; से है, जिन्‍हें औपचारिक शिक्षा के ज़रिए नहीं मिल सके। औपचारिकताओं के बन्द रास्तों की जगह &#8216;ओपन युनिवर्सिटी&#8217; छात्रों को एक खुला रास्ता प्रदान करती है। इस अर्थ में इसे &#8216;खुला&#8217; विश्‍वविद्यालय कहना ज़्यादा मुनासिब होता।</p>
<p>जो परेशानी यहाँ &#8216;मुक्ति&#8217; से शुरू हुई वही परेशानी पाठ्‍य सामग्री तैयार करते समय भी हमारा पीछा करती रही। यह परेशानी दो स्तरों पर थी या यूँ कहिए कि दो तरह की थीं। पहली, हिन्दी के एक अनुवाद की भाषा में तब्‍दील हो कर रह जाने की थी, जिसके चलते अभी भी लगातार हम, बकौल मेम्मी और फ़ानों, एक क़िस्म के स्किट्‍ज़ोफ़्रेनिया में जीते हैं। अंग्रेज़ी में सोचते हैं और फिर हिन्दी में तरजुमा करते हैं। इस समस्‍या का अपना एक लम्बा इतिहास है जो उत्तर औपनिवेशिक दशा के साथ साथ हिन्दी के ख़ास इतिहास से भी ताल्‍लुक़ रखता है और जिसका ताल्‍लुक़ इस बात से भी है कि शुद्धता के अपने आग्रह के चलते हि‍न्दी ने अपने शब्द-भंडार को बेइन्‍तहा दरिद्र कर दिया है। लिहाज़ा, जैसा कृष्‍ण कुमार कई बार कहते हैं, हम अंग्रेज़ी के &#8216;वॉटर कैचमेंट एरिया&#8217; के लिए यह मान कर शब्द ढूँढने निकलते हैं कि हमारी अपनी ज़बानों में ऐसा कोई शब्द हो ही नहीं सकता। नतीजतन, &#8216;जल सम्‍भरण क्षेत्र&#8217; जैसे मनगढंत शब्द ईजाद किए जाते हैं, जबकि &#8216;आगोर&#8217; (राजस्थान) या &#8216;आगार&#8217; (उत्तर प्रदेश) जैसे शब्‍द पहले ही हमारी भाषाओं में प्रचलित हैं। ज़ाहिर है कि एक मानक शब्दावली तैयार करने के सम्बन्ध में हम तथाकथित बोलियों से कोसों दूर रहना चाहते हैं और उर्दू से तो तौबा-तौबा। इस आग्रह का असर सिर्फ़ उर्दू या बोलियों से आने वाले शब्दों पर ही नहीं पड़ता, कुल मिलाकर यह एक अनुवादी मानसिकता तैयार कर देता है जो हर तरफ़ असर डालता है। इस तरह &#8216;नैश‍नल हाईवे&#8217; के लिए &#8216;राजमार्ग&#8217; जैसे माकूल शब्द उपलब्ध और प्रचलित होने के बावजूद &#8216;राष्‍ट्रीय उच्‍चमार्ग&#8217; जैसे अजीबो-ग़रीब शब्द गढ़े जाते हैं।</p>
<p>मगर इस आम दिक़्क़त के अलावा एक खास &#8211; दूसरी &#8211; दिक़्क़त भी है जो अकादमिक या बौद्धिक काम से, यानि ज्ञान के उत्‍पादन के कारोबार से ताल्लुक़ रखती है। यह मसला है वैचारिक अवधारणाओं का मसला। अवधारणागत शब्द महज़ शब्द नहीं होते। एक मायने में वे तकनीकी पद होते हैं। ऐसे शब्दों के बिना ज्ञान का कोई भी कारोबार सम्‍भव नहीं है। उन दिनों इगनू में पाठ्‍य सामग्री अँगरेज़ी में तैयार की जाती थी (मेरा ख़याल है कि आज भी ऐसा ही है)। फिर फ़्रीलांस अनुवादकों से इनका हिन्दी में अनुवाद कराया जाता था। अलग-अलग अनुवादक अपने-अपने हिसाब से शब्दों का तरजुमा कर दिया करते थे। नतीजतन, एक ही शब्द अलग-अलग जगह अलहदा ढंग से अनूदित होता था। यानि पाठ्‍य सामग्री में एक ढंग से और इम्तहान के परचे में एक और ढंग से। ग़नीमत समझिए कि किसी छात्र ने यह दावा नहीं किया कि फ़लां सवाल &#8216;आउट ऑफ़ कोर्स&#8217; है। चूँकि हमारे पास कोई एक टकसाली शब्दावली नहीं थी इसलिए इसका दोष अनुवादकों को देना ठीक न होगा। यह स्थिति आज भी किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय में देखने को मिल सकती है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पारम्‍परिक युनिवर्सिटियों में चालू कुंजियां मिल जाया करती हैं जिनसे छात्रों का काम जैसे तैसे चल जाता है। मगर इन विश्वविद्यालयों में भी समाज विज्ञान के विषय पढ़ाने वाले हमारे दोस्तों को आज भी परीक्षा की सुबह जाकर हिन्दी का अनुवाद &#8216;चेक करना&#8217; और छात्रों को पढ़ कर सुनाना पड़ता है और यह हिदायत देनी पड़ती है कि जवाब देने से पहले अंगरेज़ी के शब्द ज़रूर देख लें: कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी बेचारे अनुवादक ने &#8216;ईकोफ़ेमिनिज़्‍म&#8217; का तरजुमा &#8216;आर्थिक नारीवाद&#8217; कर दिया हो (ऐसा वास्तव में हो चुका है)? ऐसा हर साल होता है &#8211; होता आया है बिलानागा, साठ साल से। अफ़सोस, हिन्दी के ख़ैरख़्‍वाहों ने सिवाय नारे लगाने के और कुछ नहीं किया। और नारों से बात बननी होती तो कभी की बन गई होती।</p>
<p>समस्या को थोड़ा गहराई से समझने के लिए मिसाल के तौर पर &#8216;ऑथॉरिटी&#8217; शब्द को लें। एक मानक शब्‍दावली के अभाव में इसका अनुवाद &#8216;अधिकार&#8217; के रूप मे किया जा सकता है और ऐसा करना क़तई ग़लत न होगा। लेकिन राजनीतिक व सामाजिक थ्योरी के संदर्भ में यह शब्द अपने आप में कोई मायने नहीं रखता है। इसे अपने आसपास के शब्दों के साथ रिश्ता बनाकर अपनी सार्थकता खोजनी होती है। अब अगर इसके नज़दीक का एक और शब्द &#8216;राइट&#8217; लें तो पाएंगे कि इसके लिए भी हमारे पास &#8216;अधिकार&#8217; शब्द ही है। वैसे फ़र्क़ करने के लिए &#8216;ऑथॉरिटी&#8217; के लिए &#8216;प्राधिकार&#8217; जैसा एक मनगढंत शब्द इस्‍तेमाल किया जाने लगा है जो वृहत् हिन्‍दी कोश जैसे कोशों मे तो मिलेगा ही नहीं और जहाँ मिलेगा भी वहाँ उसके अर्थ &#8216;एकाधिकार&#8217; (इजारेदारी) से लेकर &#8216;विशेषाधिकार&#8217; (प्रिविलेज) तक फैले मिलेंगे। राजनीतिक व सामाजिक थ्योरी के संदर्भ में मैक्स वेबर के बाद से &#8216;ऑथॉरिटी&#8217; का एक और ख़ास अर्थ बन गया है। वेबर ने इस शब्द का इस्‍तेमाल &#8216;जायज़ सत्ता&#8217; (यानि सत्ता+वैधता) को रेखांकित करने के लिए किया था। शुद्धता के हमारे दुराग्रह के चलते अब हमारे पास इन तमाम तरह के पदों के लिए शब्द ही क्या बचे हैं? इधर आपके पास शब्‍दों का अभाव है और उधर, थोड़ी दूर पर, हक़, इख़्‍तियार, हुकूमत, हाकिम, महकूम आदि जैसे अनगिनत शब्द टहल रहे है। हिन्दी और उर्दू की आशनाई आप के पीठ पीछे चलती ही आई है। आपकी निगाह हटी नहीं कि उनका मिलन शुरू। अब इन्हें वैध रूप से दाखिला दे दें तो आपकी मुरझाई हुई हिन्‍दी मस्‍ती में झूम उठे।</p>
<p>ज़ाहिर है कि भाषा का थोड़ा सा उदारीकरण करने भर से हमारा शब्द भंडार कई गुणा बढ़ जाएगा। मगर इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि ऐसे अवधारणागत शब्द अपने आप में कोई मायने नहीं रखते। उनके पीछे होती है एक पूरी दुनिया, एक लम्बी बहस, एक कलाम या विमर्श, एक &#8216;अर्थतंत्र&#8217;। अर्थों के इस तंत्र में सिमटा होता है एक पूरा विचार जगत। इन शब्दों के अर्थ सिर्फ़ शब्दों में निहित नहीं होते (वैसे यह बात सभी शब्दों के बारे में कही जा सकती है), उन्हें अर्थ मिलता है थ्योरी के उस ढाँचे में जिनमें उनकी रिहाइश होती है। वहाँ अपनी बिरादरी के अन्य शब्दों के साथ रिश्ते में ही वे अर्थ पाते हैं। उसे बरतने वाले समाज वैज्ञानिकों के बीच भी उसका एक स्वीकृत अर्थ बनने लगता है। और तभी वह उस थ्योरी-विशेष के ढाँचे से आज़ाद होकर एक व्यापक मानी इख़्तियार कर लेता है। बहस मुबाहिसे का और थ्योरी-निर्माण का पूरा संदर्भ ही ग़ायब रहे और हम महज़ अनुवाद से शब्द गढ़ते चले जाएँ यह संभव नहीं। आज आप एक शब्‍द गढ़ें तो कल किसी नई थ्योरी के असर में उसके मानी पूरी तरह बदल सकते हैं।</p>
<p>मिसाल के तौर पर वेबर के ही इस पद &#8216;ऑथॉरिटी&#8217; को लें। हमने ज़िक्र किया था कि इसके आशय &#8216;वैध सत्ता&#8217; से हैं। ज़ाहिर है कि सत्ता की वैधता का सवाल &#8216;सब्जेक्‍ट&#8217; (इसके लिए &#8216;कर्त्ता&#8217; शब्‍द ग़लत होगा) की ऐसी संकल्पना से जुड़ा है जो सत्ता को मंज़ूरी या वैधता प्रदान करता है। वेबर से मिशेल फूको तक आते आते यह धारणा इस क़दर बदल जाती है कि उस सब्जेक्ट को अब एक खुद-मुख़्‍तार शै के रूप में देखना ही मुमकिन नहीं रह जाता है, जो दुनिया को उसका अर्थ प्रदान करता या करती है, या जिसके इर्द-गिर्द सत्ता और समाज वजूद में आते हैं। अब सत्ता को वैधता की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि सत्ता ही उस सब्जेक्ट को गढ़ती है जिसकी सहमति/ असहमति के ज़रिए उसके जायज़ या नाजायज़ होने का सवाल खड़ा होता है। अनुवाद की कला को हम कितना ही बेहतर क्यों न बना लें, ऐसी स्थितियों का जवाब अनुवाद में नहीं मिलेगा।</p>
<p>लिहाज़ा सवाल हिन्दी में मौलिक चिंतन का है जो साहित्येतर विषयों में तक़रीबन नदारद है। बात अनुवाद और मौलिकता की चली तो यहाँ एक बात स्पष्ट कर देनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि हम हिन्दी में मौलिकता के ऊपर अनवाद को तरजीह देते हैं। साच तो यह है कि हम अनुवाद को भी एक दोयम दर्जे का काम समझते हैं। &#8216;अनुवादी मानसिकता&#8217; दरअसल अनुवाद के काम को हीनभाव से देखने का ही नतीजा है। या यूँ कहिए कि यह मानसिकता हिन्दी के मर्ज़ का दूसरा पहलू है: जो मौलिकता का क़ायल है वही अनुवाद की अहमियत को समझ सकता है, वही उसे एक मौलिक काम के रूप में देख सकता है। हम में से कोई भी, चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो, स्वयम्भू नहीं है। हो भी नहीं सकता। हमारी सारी सर्जनात्‍मकता, दुनिया के अन्य हिस्सों में, अपनी अपनी विधाओं में हो रहे नए नए प्रयोगों के साथ संवाद में उभर कर सामने आती है। और इन सब से हमारा साबिका अनुवाद ही के ज़रिए होता है। मगर ऐसा कर पाना तभी संभव है जब हम ख़ुद अनुवाद को फ़ौरी और कामचलाऊ चीज़ों तक सीमित रखने के बजाय एक मौलिक काम के रूप में देखें &#8211; एक ऐसे काम के रूप में जिसके ज़रिए ही संस्‍कृतियों और तहज़ीबों में संवाद मुमकिन है। तभी जाकर हम सही मायने में मौलिक काम भी ढंग से कर पाएंगे।<br />
ऐसा न कर पाना ही शायद वह वजह है जिसके चलते इस पूरे इलाक़े में ज्ञान के पैदावार का पूरा कारोबार काफ़ी हद तक औपनिवेशिक उत्पादन की तर्ज़ पर होता आया है और हो रहा है। ज्ञान की अपनी एक &#8216;अर्थव्‍यवस्‍था&#8217; होती है जो वास्तविक जीवन की ज़मीन से अपना &#8216;कच्‍चा माल&#8217; बटोरती है, अपने अकादमिक कारख़ानों में बौद्धिक श्रम के ज़रिए तैयार माल पैदा करती है। फिर वह सरकुलेशन के लिए बाज़ार में छोड़ दी जाती है। हमारे यहाँ यह अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक ज़माने की अर्थव्यवस्था (इसे कलोनियल मोड ऑफ़ प्रोडक्‍शन कहा जा सकता है) जैसी है। उस ज़माने में हमारे जैसे मुल्‍कों से कच्चा माल इंग्‍लैड वगैरह जाता था और कारखानों से तैयार माल की शक्ल में फिर एक बार हमारी ही मंडियों में बिकने के लिए आया करता था। आज ज्ञान के पैदावार का कमोबेश यही तरीक़ा जारी है। इस इलाक़े का सामाजिक जीवन वह ज़मीन है जहाँ से कच्‍चा माल बटोरा जाता है। अंगरेज़ी में वह तैयार होकर आता है &#8211; थ्योरी की शक्ल में &#8211; और फिर हिन्दी का मुलम्मा चढ़ा कर उसे बाज़ार में छोड़ दिया जाता है। इस स्थिति से उबरने के लिए अनुवाद और &#8216;मौलिक काम&#8217; दोनों साथ साथ करने की ज़रूरत है। और ऐसा करते समय शायद इस बात से भी बाख़बर रहने की ज़रूरत है कि भाषाई क़िलों पर पहरेदार तैनात कर के यह काम न हो पाएगा। ज़रूरत होगी भाषा के उदारीकरण की, चारों तरफ़ से नए शब्‍द ढूँढने और बटोरने की। और यह ऐन मुमकिन है कि हर अंगरेज़ी शब्द का हमें कोई माकूल हिन्दी पर्याय न मिले। ऐसा समृद्ध से समृद्ध भाषा में भी होता है। मिसाल के तौर पर, जर्मन भाषा के हेगेलीय शब्‍द &#8216;आउफ़ेबुंग&#8217; को लें। कुछ कोशिशों के बाद अब अंगरेज़ी में इसका अनुवाद करने की कोशिश ही छोड़ दी गई है। अब इस जर्मन शब्द को ही अपना लिया गया है। ऐसे अनगिनत श्ब्द, खासकर फ़लसफ़ाई अनुशासनों में मिलेंगे। यह हमारी भाषाई ग़ुरबत का नहीं, महज़ अलग अलग सांस्‍कृतिक व बौद्धिक परिवेशों के फ़र्क़ का द्योतक है।</p>
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